य एको जालवानीशत ईशनीभि:
सर्वाॸ लोकानीशत ईशनीभि:।
य एवैक उद्भवे सम्भवे च
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥ १॥
य:=जो; एक:=एक; जालवान्=जगत् रूप जालका अधिपति; ईशनीभि:= अपनी स्वरूपभूत शासनशक्तियोंद्वारा; ईशते=शासन करता है; ईशनीभि:=उन विविध शासन-शक्तियोंद्वारा; सर्वान्=सम्पूर्ण; लोकान् ईशते=लोकोंपर शासन करता है; य:=(तथा) जो; एक:=अकेला; एव=ही; सम्भवे च उद्भवे=सृष्टि और उसके विस्तारमें (सर्वथा समर्थ है); एतत् =इस ब्रह्मको; ये=जो महापुरुष; विदु:=जान लेते हैं; ते=वे; अमृता:=अमर; भवन्ति=हो जाते हैं॥ १॥
व्याख्या—जो एक—अद्वितीय परमात्मा जगत्-रूप जालकी रचना करके अपनी स्वरूपभूत शासन-शक्तियोंद्वारा उसपर शासन कर रहे हैं तथा उन विविध शासन-शक्तियोंद्वारा समस्त लोकों और लोकपालोंका यथायोग्य संचालन कर रहे हैं—जिनके शासनमें ये सब अपने-अपने कर्तव्योंका नियमपूर्वक पालन कर रहे हैं तथा जो अकेले ही बिना किसी दूसरेकी सहायता लिये समस्त जगत्की उत्पत्ति और उसका विस्तार करनेमें सर्वथा समर्थ हैं, उन परब्रह्म परमेश्वरको जो महापुरुष तत्त्वसे जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं—जन्म-मृत्युके जालसे सदाके लिये छूट जाते हैं॥ १॥