यो देवो अग्नौ यो अप्सु
यो विश्वं भुवनमाविवेश।
य ओषधीषु यो वनस्पतिषु
तस्मै देवाय नमो नम:॥ १७॥
य:=जो; देव:=परमदेव परमात्मा; अग्नौ=अग्निमें है; य:=जो; अप्सु=जलमें है; य:=जो; विश्वम् भुवनम् आविवेश=समस्त लोकोंमें प्रविष्ट हो रहा है; य:=जो; ओषधीषु=ओषधियोंमें है; (तथा) य:=जो; वनस्पतिषु=वनस्पतियोंमें है; तस्मै देवाय=उन परमदेव परमात्माके लिये; नम:=नमस्कार है; नम:=नमस्कार है॥ १७॥
व्याख्या—जो सर्वशक्तिमान् पूर्णब्रह्म परमदेव अग्निमें हैं, जो जलमें हैं, जो समस्त लोकोंमें अन्तर्यामीरूपसे प्रविष्ट हो रहे हैं, जो ओषधियोंमें हैं और जो वनस्पतियोंमें हैं—अर्थात् जो सर्वत्र परिपूर्ण हैं जिनका अनेक प्रकारसे पहले वर्णन कर आये हैं, उन परमदेव परमात्माको नमस्कार है। नमस्कार है। ‘नम:’ शब्दको दुहरानेका अभिप्राय अध्यायकी समाप्तिको सूचित करना है॥ १७॥