यथैव विम्बं मृदयोपलिप्तं
तेजोमयं भ्राजते तत् सुधान्तम्
तद्वाऽऽत्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही
एक: कृतार्थो भवते वीतशोक:॥ १४॥
यथा=जिस प्रकार; मृदया=मिट्टीसे; उपलिप्तम्=लिप्त होकर मलिन हुआ; [यत् ]=जो; तेजोमयम्=प्रकाशयुक्त; विम्बम्=रत्न है; तत् एव=वही; सुधान्तम्=भलीभाँति धुल जानेपर; भ्राजते=चमकने लगता है; तत् वा=उसी प्रकार; देही=शरीरधारी (जीवात्मा); आत्मतत्त्वम्=(मल आदिसे रहित) आत्मतत्त्वको; प्रसमीक्ष्य=(योगके द्वारा) भलीभाँति प्रत्यक्ष करके; एक:=अकेला कैवल्य अवस्थाको प्राप्त; वीतशोक:=सब प्रकारके दु:खोंसे रहित; (तथा) कृतार्थ:=कृतकृत्य; भवते=हो जाता है॥ १४॥
व्याख्या—जिस प्रकार कोई तेजोमय रत्न मिट्टीसे लिप्त रहनेके कारण छिपा रहता है, अपने असली रूपमें प्रकट नहीं होता, परंतु वही जब मिट्टी आदिको हटाकर धो-पोंछकर साफ कर लिया जाता है, तब अपने असली रूपमें चमकने लगता है, उसी प्रकार इस जीवात्माका वास्तविक स्वरूप अत्यन्त स्वच्छ होनेपर भी अनन्त जन्मोंमें किये हुए कर्मोंके संस्कारोंसे मलिन हो जानेके कारण प्रत्यक्ष प्रकट नहीं होता; परंतु जब मनुष्य ध्यानयोगके साधनद्वारा समस्त मलोंको धोकर आत्माके यथार्थ स्वरूपको भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लेता है, तब वह असङ्ग हो जाता है। अर्थात् उसका जो जड पदार्थोंके साथ संयोग हो रहा था, उसका नाश होकर वह कैवल्य अवस्थाको प्राप्त हो जाता है तथा उसके सब प्रकारके दु:खोंका अन्त होकर वह सर्वथा कृतकृत्य हो जाता है। उसका मनुष्य-जन्म सार्थक हो जाता है (योग० ४। ३४)॥ १४॥