युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभि-
र्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरे:।
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा
आ ये धामानि दिव्यानि तस्थु:॥ ५॥ *
* यह मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ११का पाँचवाँ है और ऋग्वेद (१०। १३। १) में भी है।
(हे मन और बुद्धि! मैं) वाम्=तुम दोनोंके (स्वामी); पूर्व्यम्=सबके आदि; ब्रह्म=पूर्णब्रह्म परमात्मासे; नमोभि:=बार-बार नमस्कारके द्वारा; युजे=संयुक्त होता हूँ; श्लोक:=मेरा वह स्तुति-पाठ; सुरे:=श्रेष्ठ विद्वान्की; पथ्या इव=कीर्तिकी भाँति; व्येतु (वि+एतु)=सर्वत्र फैल जाय; (जिससे) अमृतस्य=अविनाशी परमात्माके; विश्वे=समस्त; पुत्रा:=पुत्र; ये=जो; दिव्यानि=दिव्य; धामानि=लोकोंमें; आतस्थु:=निवास करते हैं; शृण्वन्तु=सुनें॥ ५॥
व्याख्या—हे मन और बुद्धि! मैं तुम दोनोंके स्वामी और समस्त जगत्के आदिकारण परब्रह्म परमात्माको बार-बार नमस्कार करके विनयपूर्वक उनकी शरणमें जाकर उनमें संलग्न होता हूँ। मेरे द्वारा जो उन परमेश्वरकी महिमाका वर्णन किया गया है, वह विद्वान् पुरुषकी कीर्तिके समान समस्त जगत्में व्याप्त हो जाय। उसे अविनाशी परमात्माके वे सभी पुत्र, जो दिव्य लोकोंमें निवास करते हैं, भलीभाँति सुनें॥ ५॥
सम्बन्ध—ध्यानके लिये परमात्मासे स्तुति करनेका प्रकार बतलानेके अनन्तर अब छठे मन्त्रमें उस ध्यानकी स्थितिका वर्णन करके सातवेंमें मनुष्यको उस ध्यानमें लग जानेके लिये आदेश दिया जाता है—