युञ्जते मन उत युञ्जते धियो
विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चित:।
वि होत्रा दधे वयुनाविदेक
इन्मही देवस्य सवितु: परिष्टुति:॥ ४॥ *
* यह यजुर्वेद अध्याय ११का चौथा और अध्याय ५ का १४ वाँ मन्त्र है तथा ऋग्वेद (५। ८१। १) में भी है।
(जिसमें) विप्रा:=ब्राह्मण आदि; मन:=मनको; युञ्जते=लगाते हैं; उत=और; धिय:=बुद्धिकी वृत्तियोंको भी; युञ्जते=लगाते हैं; (जिसने समस्त) होत्रा: वि दधे=अग्निहोत्र आदि शुभ कर्मोंका विधान किया है; (तथा जो) वयुनावित् =समस्त जगत्के विचारोंको जाननेवाला; (और) एक:=एक है; (उस) बृहत:=सबसे महान्; विप्रस्य=सर्वत्र व्यापक; विपश्चित:=सर्वज्ञ; (एवं) सवितु:=सबके उत्पादक; देवस्य=परमदेव परमेश्वरकी; इत्=निश्चय ही; (हमें) मही=महती; परिष्टुति:=स्तुति (करनी चाहिये)॥ ४॥
व्याख्या—जिन परब्रह्म परमात्मामें श्रेष्ठ बुद्धिवाले ब्राह्मणादि अधिकारी मनुष्य अपने मनको लगाते हैं तथा अपनी सब प्रकारकी बुद्धि-वृत्तियोंको भी नियुक्त करते हैं, जिन्होंने अग्निहोत्र आदि समस्त शुभ कर्मोंका विधान किया है, जो समस्त जगत्के विचारोंको जाननेवाले और एक—अद्वितीय हैं, उन सबसे महान्, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सबके उत्पादक परमदेव परमेश्वरकी अवश्य ही हमें भूरि-भूरि स्तुति करनी चाहिये॥ ४॥