युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितु: सवे। सुवर्गेयाय शक्त्या॥ २॥ *
* ये मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ११ का २ है।
वयम्=हमलोग; सवितु:=सबको उत्पन्न करनेवाले; देवस्य=परमदेव परमेश्वरकी; सवे=आराधनारूप यज्ञमें; युक्तेन मनसा=लगे हुए मनके द्वारा; सुवर्गेयाय=स्वर्गीय सुख (भगवत्-प्राप्ति-जनित आनन्द)की प्राप्तिके लिये; शक्त्या=पूरी शक्तिसे; [प्रयतामहै]=प्रयत्न करें॥ २॥
व्याख्या—हमलोग सबको उत्पन्न करनेवाले; परमदेव परमेश्वरकी आराधनारूप यज्ञमें लगे हुए मनके द्वारा परमानन्दप्राप्तिके लिये पूर्णशक्तिसे प्रयत्न करें। अर्थात् हमारा मन निरन्तर भगवान्की आराधनामें लगा रहे और हम भगवत्-प्राप्ति-जनित परमानन्दकी अनुभूतिके लिये पूर्ण शक्तिसे प्रयत्नशील रहें॥ २॥