ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानि:
क्षीणै: क्लेशैर्जन्ममृत्युप्रहाणि:।
तस्याभिध्यानात् तृतीयं देहभेदे
विश्वैश्वर्यं केवल आप्तकाम:॥ ११॥
तस्य=उस परमदेवका; अभिध्यानात् =निरन्तर ध्यान करनेसे; देवम्=उस प्रकाशमय परमात्माको; ज्ञात्वा=जान लेनेपर; सर्वपाशापहानि:=समस्त बन्धनोंका नाश हो जाता है; (क्योंकि) क्लेशै: क्षीणै:=क्लेशोंका नाश हो जानेके कारण; जन्ममृत्युप्रहाणि:=जन्म-मृत्युका सर्वथा अभाव हो जाता है; (अत: वह) देहभेदे=शरीरका नाश होनेपर; तृतीयम्=तीसरे लोक (स्वर्ग) तकके; विश्वैश्वर्यम् [त्यक्त्वा]=समस्त ऐश्वर्यका त्याग करके; केवल:=सर्वथा विशुद्ध; आप्तकाम:=पूर्णकाम हो जाता है॥ ११॥
व्याख्या—परमपुरुष परमात्माका निरन्तर ध्यान करते-करते जब साधक उन परमदेवको जान लेता है, तब इसके समस्त बन्धनोंका सदाके लिये सर्वथा नाश हो जाता है; क्योंकि अविद्या, अस्मिता (अहंकार) राग, द्वेष और मरणभय—इन पाँचों क्लेशोंका नाश हो जानेके कारण उसके जन्म-मरणका सदाके लिये अभाव हो जाता है। अत: वह फिर कभी बन्धनमें नहीं पड़ सकता। वह इस शरीरका नाश होनेपर तृतीय लोक अर्थात् स्वर्गके सबसे ऊँचे स्तर—ब्रह्मलोकतकके बड़े-से-बड़े समस्त ऐश्वर्योंका त्याग करके प्रकृतिसे वियुक्त, सर्वथा विशुद्ध कैवल्यपदको प्राप्त हो पूर्णकाम हो जाता है—उसे किसी प्रकारकी कामना नहीं रहती; क्योंकि वह सम्पूर्ण कामनाओंका फल पा लेता है॥ ११॥
सम्बन्ध—जानने योग्य तत्त्वका पुन: वर्णन किया जाता है—