क्षरं प्रधानममृताक्षरं हर:
क्षरात्मानावीशते देव एक:।
तस्याभिध्यानाद् योजनात् तत्त्वभावाद्
भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्ति:॥ १०॥
प्रधानम्=प्रकृति तो; क्षरम्=विनाशशील है; हर:=इनको भोगनेवाला जीवात्मा; अमृताक्षरम्=अमृतस्वरूप अविनाशी है; क्षरात्मानौ=इन विनाशशील जड-तत्त्व और चेतन आत्मा—दोनोंको; एक:=एक; देव:=ईश्वर; ईशते=अपने शासनमें रखता है; (इस प्रकार जानकर) तस्य=उसका; अभिध्यानात् =निरन्तर ध्यान करनेसे; योजनात् =मनको उसमें लगाये रहनेसे; च=तथा; तत्त्वभावात् =तन्मय हो जानेसे; अन्ते=अन्तमें (उसीको प्राप्त हो जाता है); भूय:=फिर; विश्वमायानिवृत्ति:=समस्त मायाकी निवृत्ति हो जाती है॥ १०॥
व्याख्या—प्रकृति तो क्षर अर्थात् परिवर्तन होनेवाली, विनाशशील है और इसको भोगनेवाला जीव-समुदाय अविनाशी अक्षरतत्त्व है। (गीता ७। ४-५; १५। १६) इन क्षर और अक्षर (जडप्रकृति और चेतन जीव-समुदाय)— दोनों तत्त्वोंपर एक परमदेव परमेश्वर शासन करते हैं, (गीता १५। १७) वे ही प्राप्त करनेके और जाननेके योग्य हैं, उन्हें तत्त्वोंसे जानना चाहिये—इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उन परमदेव परमात्माका निरन्तर ध्यान करनेसे, उन्हींमें रात-दिन संलग्न रहनेसे और उन्हींमें तन्मय हो जानेसे अन्तमें यह उन्हींको पा लेता है। फिर इसके सम्पूर्ण मायाकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है, अर्थात् मायामय जगत्से इसका सम्बन्ध सर्वथा छूट जाता है॥ १०॥
सम्बन्ध—उन परमदेवको जाननेका फल पुन: बताया जाता है—