ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशनीशा-
वजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता।
अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता
त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत् ॥ ९॥
ज्ञाज्ञौ=सर्वज्ञ और अज्ञानी; ईशनीशौ=सर्वसमर्थ और असमर्थ; द्वौ=ये दो; अजौ=अजन्मा आत्मा हैं; हि=तथा इनके सिवा; भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता=भोगनेवाले जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग्य-सामग्रीसे युक्त; अजा=अनादि प्रकृति; एका=एक तीसरी शक्ति है; (इन तीनोंमें जो ईश्वरतत्त्व है, वह शेष दोसे विलक्षण है) हि=क्योंकि; आत्मा=वह परमात्मा; अनन्त:=अनन्त; विश्वरूप:=सम्पूर्ण रूपोंवाला; च=और; अकर्ता=कर्तापनके अभिमानसे रहित है; यदा=जब; (मनुष्य इस प्रकार) एतत् त्रयम्=ईश्वर, जीव और प्रकृति—इन तीनोंको; ब्रह्मम्=ब्रह्मरूपमें; विन्दते=प्राप्त कर लेता है (तब वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है)॥ ९॥
व्याख्या—ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् हैं, जीव अल्पज्ञ और अल्प शक्तिवाला है; ये दोनों ही अजन्मा हैं। इनके सिवा एक तीसरी शक्ति भी अजन्मा है जिसे प्रकृति कहते हैं; यह भोक्ता जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग-सामग्री प्रस्तुत करती है। यद्यपि ये तीनों ही अजन्मा हैं—अनादि हैं, फिर भी ईश्वर शेष दो तत्त्वोंसे विलक्षण हैं; क्योंकि वे परमात्मा अनन्त हैं। (गीता १५। १६-१७) सम्पूर्ण विश्व उन्हींका स्वरूप—विराट् शरीर है। वे सब कुछ करते हुए—सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्ति, पालन और संहार करते हुए भी वास्तवमें कुछ नहीं करते; क्योंकि वे कर्तापनके अभिमानसे रहित हैं। (गीता ४। १३) मनुष्य जब इस प्रकार इन तीनोंकी विलक्षणता और विभिन्नताको समझते हुए ही इन्हें ब्रह्मरूपमें उपलब्ध कर लेता है अर्थात् प्रकृति और जीव तो उन परमेश्वरकी प्रकृतियाँ हैं और परमेश्वर इनके स्वामी हैं—इस प्रकार प्रत्यक्ष कर लेता है, तब वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है॥ ९॥
सम्बन्ध—पहले, आठवें और नवें मन्त्रमें कहे हुए तीनों तत्त्वोंका स्पष्टीकरण अगले मन्त्रमें किया जाता है—