संयुक्तमेतत् क्षरमक्षरं च
व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीश:।
अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावा-
ज्ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशै:॥ ८॥
क्षरम्=विनाशशील जडवर्ग; च=एवं; अक्षरम्=अविनाशी जीवात्मा; संयुक्तम्=(इन दोनोंके) संयोगसे बने हुए; व्यक्ताव्यक्तम्=व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप; एतत् विश्वम्=इस विश्वको; ईश:=परमेश्वर ही; भरते=धारण और पोषण करता है; च=तथा; आत्मा=जीवात्मा; भोक्तृभावात् =इस जगत्के विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण; अनीश:=प्रकृतिके अधीन असमर्थ हो; बध्यते=इसमें बँध जाता है; (और) देवम्=उस परमदेव परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; सर्वपाशै:=सब प्रकारके बन्धनोंसे; मुच्यते=मुक्त हो जाता है॥ ८॥
व्याख्या—विनाशशील जडवर्ग जिसे भगवान्की अपरा प्रकृति तथा क्षरतत्त्व कहा गया है और भगवान्की परा प्रकृतिरूप जीवसमुदाय, जो अक्षरतत्त्वके नामसे पुकारा जाता है—इन दोनोंके संयोगसे बने हुए, प्रकट (स्थूल) और अप्रकट (सूक्ष्म) रूपमें स्थित इस समस्त जगत्का वे परमपुरुष पुरुषोत्तम ही धारण-पोषण करते हैं, जो सबके स्वामी, सबके प्रेरक तथा सबका यथायोग्य संचालन और नियमन करनेवाले परमेश्वर हैं। जीवात्मा इस जगत्के विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण प्रकृतिके अधीन हो इसके मोहजालमें फँसा रहता है, उन परमदेव परमात्माकी ओर दृष्टिपात नहीं करता। जब कभी यह उन सर्वसुहृद् परमात्माकी अहैतुकी दयासे महापुरुषोंका सङ्ग पाकर उनको जाननेका अभिलाषी होकर पूर्ण चेष्टा करता है, तब उन परमदेव परमेश्वरको जानकर सब प्रकारके बन्धनोंसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है॥ ८॥
सम्बन्ध—पुन: जीवात्मा, परमात्मा और प्रकृति—इन तीनोंके स्वरूपका पृथक्-पृथक् वर्णन करके, इस तत्त्वको जानकर उपासना करनेका फल दो मन्त्रोंद्वारा बताया जाता है—