उद्गीतमेतत् परमं तु ब्रह्म
तस्मिंस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च।
अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा
लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ता:॥ ७॥
एतत्=यह; उद्गीतम्=वेदवर्णित; परमम् ब्रह्म=परब्रह्म; तु=ही; सुप्रतिष्ठा= सर्वश्रेष्ठ आश्रय; च=और; अक्षरम्=अविनाशी है; तस्मिन्=उसमें; त्रयम्=तीनों लोक स्थित हैं; ब्रह्मविद:=वेदके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुष; अत्र=यहाँ (हृदयमें); अन्तरम्=अन्तर्यामीरूपसे स्थित उस ब्रह्मको; विदित्वा=जानकर; तत्परा:=उसीके परायण हो; ब्रह्मणि=उस परब्रह्ममें; लीना:=लीन होकर; योनिमुक्ता:=सदाके लिये जन्म-मृत्युसे मुक्त हो गये॥ ७॥
व्याख्या—जिनकी महिमाका वेदोंमें गान किया गया है, जो परब्रह्म परमात्मा सबके सर्वोत्तम आश्रय हैं, उन्हींमें तीनों लोकोंका समुदायरूप समस्त विश्व स्थित है। वे ही ऊपर बताये हुए सबके प्रेरक, कभी नाश न होनेवाले परम अक्षर, परम देव हैं। जिन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमात्माकी दिव्यशक्तिका दर्शन किया था, वे वेदके रहस्यको समझनेवाले ऋषिलोग उन सबके प्रेरक परमात्माको यहाँ—अपने हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान समझकर, उन्हींके परायण होकर अर्थात् सर्वतोभावसे उनकी शरणमें जाकर, उन्हींमें लीन हो गये और सदाके लिये जन्म-मरणरूप योनिसे मुक्त हो गये। उनके मार्गका अनुसरण करके हम सब लोग भी उन्हींकी भाँति जन्म-मरणसे छूटकर परमात्मामें लीन हो सकते हैं॥ ७॥
सम्बन्ध—अब उन परमात्माके स्वरूपका वर्णन करके उन्हें जाननेका फल बताया जाता है—