पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहु: परे अर्धे पुरीषिणम्। अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति॥ ११॥ *
* यह मन्त्र अथर्ववेद काण्ड ९ सूक्त १४ का बारहवाँ तथा ऋग्वेद मण्डल १ सूक्त १६४ का बारहवाँ है।
(कितने ही लोग तो इस सूर्यको); पञ्चपादम्=पाँच चरणोंवाला; पितरम्=सबका पिता; द्वादशाकृतिम्=बारह आकृतियोंवाला; पुरीषिणम्=जलका उत्पादक; दिव: परे अर्धे=(और) स्वर्गलोकसे भी ऊपरके स्थानमें (स्थित); आहु:=बतलाते हैं; अथ इमे=तथा ये; अन्ये उ=दूसरे कितने ही लोग; इति आहु:=ऐसा बतलाते हैं (कि यह); परे=विशुद्ध; सप्तचक्रे=सात पहियोंवाले (और); षडरे=छ: अरोंवाले (रथमें); अर्पितम्=बैठा हुआ (एवं); विचक्षणम्=सबको भलीभाँति जाननेवाला है॥ ११॥
व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वरके प्रत्यक्ष—दृष्टिगोचरस्वरूप इस सूर्यके विषयमें कितने ही तत्त्ववेत्ता तो यों कहते हैं कि इसके पाँच पैर हैं। अर्थात् छ: ऋतुओंमेंसे हेमन्त और शिशिर—इन दो ऋतुओंकी एकता करके पाँच ऋतुओंको वे इस सूर्यके पाँच चरण बतलाते हैं; तथा यह भी कहते हैं कि बारह महीने ही इसकी बारह आकृतियाँ अर्थात् बारह शरीर हैं। इसका स्थान स्वर्गलोकसे भी ऊँचा है। स्वर्गलोक भी इसीके आलोकसे प्रकाशित है। इस लोकमें जो जल बरसता है, उस जलकी उत्पत्ति इसीसे होती है। अत: सबको जलरूप जीवन प्रदान करनेवाला होनेसे यह सबका पिता है। दूसरे ज्ञानी पुरुषोंका कहना है कि लाल, पीले आदि सात रंगोंकी किरणोंसे युक्त तथा वसन्त आदि छ: ऋतुओंके हेतुभूत इस विशुद्ध प्रकाशमय सूर्यमण्डलमें— जिसे सात चक्र एवं छ: अरोंवाला रथ कहा गया है—बैठा हुआ इसका आत्मारूप, सबको भलीभाँति जाननेवाला सर्वज्ञ परमेश्वर ही उपास्य है। यह स्थूल नेत्रोंसे दिखायी देनेवाला सूर्यमण्डल उसका शरीर है। इसलिये यह उसीकी महिमा है॥ ११॥