स एष वैश्वानरो विश्वरूप: प्राणोऽग्निरुदयते। तदेतदृचाभ्युक्तम्॥ ७॥
स: एष:=वह यह सूर्य ही; उदयते=उदय होता है; वैश्वानर: अग्नि:=(जो कि) वैश्वानर अग्नि (जठराग्नि) (और); विश्वरूप: प्राण:=विश्वरूप प्राण है; तत् एतत् =वही यह बात; ऋचा=ऋचाद्वारा; अभ्युक्तम्=आगे कही गयी है॥ ७॥
व्याख्या—प्राणियोंके शरीरमें जो वैश्वानर नामसे कही जानेवाली जठराग्नि है, जिससे अन्नका पाचन होता है (गीता १५। १४), वह सूर्यका ही अंश है; अत: सूर्य ही है। तथा जो प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—इन पाँच रूपोंमें विभक्त प्राण है, वह भी इस उदय होनेवाले सूर्यका ही अंश है; अत: सूर्य ही है। यही बात अगली ऋचाद्वारा समझायी गयी है॥ ७॥
विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं
परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम्।
सहस्ररश्मि: शतधा वर्तमान:
प्राण: प्रजानामुदयत्येष सूर्य:॥ ८॥
विश्वरूपम्=सम्पूर्ण रूपोंके केन्द्र; जातवेदसम्=सर्वज्ञ; परायणम्=सर्वाधार; ज्योति:=प्रकाशमय; तपन्तम्=तपते हुए; हरिणम्=किरणोंवाले सूर्यको; एकम्=अद्वितीय (बतलाते हैं); एष:=यह; सहस्ररश्मि:=सहस्रों किरणोंवाला; सूर्य:=सूर्य; शतधा वर्तमान:=सैकड़ों प्रकारसे वर्तता हुआ; प्रजानाम्=समस्त जीवोंका; प्राण:=प्राण (जीवनदाता) होकर; उदयति=उदय होता है॥ ८॥
व्याख्या—इस सूर्यके तत्त्वको जाननेवालोंका कहना है कि यह किरण-जालसे मण्डित एवं प्रकाशमय, तपता हुआ सूर्य विश्वके समस्त रूपोंका केन्द्र है। सभी रूप (रंग और आकृतियाँ) सूर्यसे उत्पन्न और प्रकाशित होते हैं। यह सविता ही सबका उत्पत्तिस्थान है और यही सबकी जीवन-ज्योतिका मूल स्रोत है। यह सर्वज्ञ और सर्वाधार है, वैश्वानर अग्नि और प्राण-शक्तिके रूपमें सर्वत्र व्याप्त है और सबको धारण किये हुए है। समस्त जगत्का प्राणरूप सूर्य एक ही है—इसके समान इस जगत्में दूसरी कोई भी जीवनी शक्ति नहीं है। यह सहस्रों किरणोंवाला सूर्य हमारे सैकड़ों प्रकारके व्यवहार सिद्ध करता हुआ उदय होता है। जगत्में उष्णता और प्रकाश फैलाना, सबको जीवन प्रदान करना, ऋतुओंका परिवर्तन करना आदि हमारी सैकड़ों प्रकारकी आवश्यकताओंको पूर्ण करता हुआ सम्पूर्ण सृष्टिका जीवनदाता प्राण ही सूर्यके रूपमें उदित होता है॥ ८॥
सम्बन्ध—इस प्रकार यहाँतक कात्यायन कबन्धीके प्रश्नानुसार संक्षेपमें यह बताया गया कि उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरसे ही उसके संकल्पद्वारा प्राण और रयिके संयोगसे इस सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति आदि होती है। अब इस प्राणशक्ति और रयिशक्तिके सम्बन्धसे परमेश्वरकी उपासनाका प्रकार और उसका फल बतलानेके लिये दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं—