अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ।
भगवन् कुतो ह वा इमा: प्रजा: प्रजायन्त इति॥ ३॥
अथ=तदनन्तर (उनमेंसे); कात्यायन: कबन्धी=कत्य ऋषिके प्रपौत्र कबन्धीने; उपेत्य=(पिप्पलाद ऋषिके) पास जाकर; पप्रच्छ=पूछा—; भगवन्=भगवन्!; कुत: ह वै=किस प्रसिद्ध और सुनिश्चित कारणविशेषसे; इमा: प्रजा:=यह सम्पूर्ण प्रजा; प्रजायन्ते=नाना रूपोंमें उत्पन्न होती है; इति=यह मेरा प्रश्न है॥ ३॥
व्याख्या—महर्षि पिप्पलादकी आज्ञा पाकर वे लोग श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए वहीं तपश्चर्या करने लगे। महर्षिकी देख-रेखमें संयमपूर्वक रहकर एक वर्षतक उन्होंने त्यागमय जीवन बिताया। उसके बाद वे सब पुन: पिप्पलाद ऋषिके पास गये तथा उनमेंसे सर्वप्रथम कत्य ऋषिके प्रपौत्र कबन्धीने श्रद्धा और विनयपूर्वक पूछा—‘भगवन्! जिससे ये सम्पूर्ण चराचर जीव नाना रूपोंमें उत्पन्न होते हैं, जो इनका सुनिश्चित परम कारण है, वह कौन है?’॥ ३॥