तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्याम: सर्वं ह वो वक्ष्याम इति॥ २॥
तान् स: ह=उन सुकेशा आदि ऋषियोंसे वे प्रसिद्ध; ऋषि: उवाच= (पिप्पलाद) ऋषि बोले—; भूय: एव=तुमलोग पुन:; श्रद्धया=श्रद्धाके साथ; ब्रह्मचर्येण=ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए; (और) तपसा=तपस्यापूर्वक; संवत्सरम्=एक वर्षतक (यहाँ); संवत्स्यथ=भलीभाँति निवास करो; यथाकामम्=(उसके बाद) अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार; प्रश्नान् पृच्छत=प्रश्न पूछना; यदि विज्ञास्याम:=यदि (तुम्हारी पूछी हुई बातोंको) मैं जानता होऊँगा; ह सर्वम्=तो नि:संदेह वे सब बातें; व: वक्ष्याम: इति=तुमलोगोंको बताऊँगा॥ २॥
व्याख्या—उपर्युक्त छहों ऋषियोंको परब्रह्मकी जिज्ञासासे अपने पास आया देखकर महर्षि पिप्पलादने उनसे कहा—तुमलोग तपस्वी हो, तुमने ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक साङ्गोंपाङ्ग वेद पढ़े हैं; तथापि मेरे आश्रममें रहकर पुन: एक वर्षतक श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए तपश्चर्या करो। उसके बाद तुमलोग जो चाहो, मुझसे प्रश्न करना। यदि तुम्हारे पूछे हुए विषयका मुझे ज्ञान होगा तो निस्संदेह तुम्हें सब बातें भलीभाँति समझाकर बताऊँगा॥ २॥
सम्बन्ध—ऋषिके आज्ञानुसार सबने श्रद्धा, ब्रह्मचर्य और तपस्याके साथ विधिपूर्वक एक वर्षतक वहाँ निवास किया।