अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिन:।
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते॥
एतद्वै तत् ॥ ४॥
अस्य=इस; शरीरस्थस्य=शरीरमें स्थित; विस्रंसमानस्य=एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेवाले; देहिन:=जीवात्माके; देहात् =शरीरसे; विमुच्यमानस्य=निकल जानेपर; अत्र=यहाँ (इस शरीरमें) किम् परिशिष्यते=क्या शेष रहता है; एतत् वै=यही है; तत् =वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था)॥ ४॥
व्याख्या—यह एक शरीरसे दूसरे शरीरमें गमन करनेके स्वभाववाला देही (जीवात्मा) जब इस वर्तमान शरीरसे निकलकर चला जाता है और उसके साथ ही जब इन्द्रिय, प्राण आदि भी चले जाते हैं, तब इस मृत-शरीरमें क्या बच रहता है। देखनेमें तो कुछ भी नहीं रहता; पर वह परब्रह्म परमेश्वर, जो सदा-सर्वदा समानभावसे सर्वत्र परिपूर्ण है, जो चेतन जीव तथा जड प्रकृति—सभीमें सदा व्याप्त है, वह रह जाता है। यही वह ब्रह्म है, जिसके सम्बन्धमें तुमने पूछा था॥ ४॥
सम्बन्ध—अब निम्नाङ्कित दो मन्त्रोंमें यमराज नचिकेताके पूछे हुए तत्त्वको पुन: दूसरे प्रकारसे वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं—