ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति।
मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते॥ ३॥
प्राणम्=(जो) प्राणको; ऊर्ध्वम्=ऊपरकी ओर; उन्नयति=उठाता है (और); अपानम्=अपानको; प्रत्यक् अस्यति=नीचे ढकेलता है; मध्ये=शरीरके मध्य (हृदय) में; आसीनम्=बैठे हुए (उस); वामनम्=सर्वश्रेष्ठ भजनेयोग्य परमात्माकी; विश्वे देवा:=सभी देवता; उपासते=उपासना करते हैं॥ ३॥
व्याख्या—शरीरमें नियमितरूपसे अनवरत प्राण-अपानादिकी क्रिया हो रही है; इन जड पदार्थोंमें जो क्रियाशीलता आ रही है, वह उन परमात्माकी शक्ति और प्रेरणासे ही आ रही है। वे ही मानव-हृदयमें राजाकी भाँति विराजित रहकर प्राणको ऊपरकी ओर चढ़ा रहे हैं और अपानको नीचेकी ओर ढकेल रहे हैं। इस प्रकार वे शरीरके अंदर होनेवाले सारे व्यापारोंका सुचारुरूपसे सम्पादन कर रहे हैं। उन हृदयस्थित परम भजनीय परब्रह्म पुरुषोत्तमकी सभी देवता उपासना कर रहे हैं—शरीरस्थित प्राण, मन, बुद्धि-इन्द्रियादिके सभी अधिष्ठातृदेवता उन परमेश्वरकी प्रसन्नताके लिये उन्हींकी प्रेरणाके अनुसार नित्य सावधानीके साथ समस्त कार्योंका यथाविधि सम्पादन करते रहते हैं॥ ३॥