अरण्योर्निहितो जातवेदा
गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभि:।
दिवे दिव ईडॺो जागृवद्भि-
र्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्नि:*॥
एतद्वै तत्॥ ८॥
* यह मन्त्र ऋग्वेद (मण्डल ३ सू० २९। २) में और सामवेद (पूर्वार्चिक खण्ड ८। ७) में भी है।
[य:]=जो; जातवेदा:=सर्वज्ञ; अग्नि:=अग्निदेवता; गर्भिणीभि:=गर्भिणी स्त्रियोंद्वारा; सुभृत:=भली प्रकार धारण किये हुए; गर्भ:=गर्भकी; इव=भाँति; अरण्यो:=दो अरणियोंमें; निहित:=सुरक्षित है—छिपा है (तथा जो); जागृवद्भि:=सावधान (और); हविष्मद्भि:=हवन करनेयोग्य सामग्रियोंसे युक्त; मनुष्येभि:=मनुष्योंद्वारा, दिवे दिवे=प्रतिदिन; ईडॺ:=स्तुति करनेयोग्य (है); एतत् वै=यही है; तत् =वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था)॥ ८॥
व्याख्या—जिस प्रकार गर्भिणी स्त्रीके द्वारा धारण किया हुआ शुद्ध अन्न-पानादिसे परिपुष्ट बालक गर्भमें छिपा रहता है, उसी प्रकार जो सर्वज्ञ अग्निदेवता अधर और उत्तर अरणि (ऊपर-नीचेके काष्ठखण्ड)-के भीतर छिपे हुए हैं तथा अग्निविद्याके जाननेवाले, प्रयत्नशील, सावधान, श्रद्धालु, सब प्रकारकी आवश्यक सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्यगण प्रतिदिन जिनकी स्तुति और आदर किया करते हैं, वे अग्निदेवता सर्वज्ञ परमेश्वरके ही प्रतीक हैं। नचिकेता! ये ही वे तुम्हारे पूछे हुए ब्रह्म हैं॥ ८॥