य: पूर्वं तपसो जातमद्भ्य: पूर्वमजायत।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत् ॥
एतद्वै तत् ॥ ६॥
य:=जो; अद्भ्य:=जलसे; पूर्वम्=पहले; अजायत=हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुआ था; [तम्]=उस; पूर्वम्=सबसे पहले; तपस: जातम्=तपसे उत्पन्न; गुहाम् प्रविश्य=हृदय-गुफामें प्रवेश करके; भूतेभि: [सह]=जीवात्माओंके साथ; तिष्ठन्तम्=स्थित रहनेवाले परमेश्वरको; य:=जो पुरुष; व्यपश्यत् =देखता है (वही ठीक देखता है); एतत् वै=यह ही है; तत् =वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था)॥ ६॥
व्याख्या—जो जलसे उपलक्षित पाँचों महाभूतोंसे पहले हिरण्यगर्भ ब्रह्माके रूपमें प्रकट हुए थे, उन अपने ही संकल्परूप तपसे प्रकट होनेवाले और सब जीवोंके हृदयरूप गुफामें प्रविष्ट होकर उनके साथ रहनेवाले परमेश्वरको जो इस प्रकार जानता है कि ‘सबके हृदयमें निवास करनेवाले सबके अन्तर्यामी परमेश्वर एक ही हैं, यह सम्पूर्ण जगत् उन्हींकी महिमाका प्रकाश करता है, वही यथार्थ जानता है। वे सदा सबके हृदयमें रहनेवाले ही ये तुम्हारे पूछे हुए परब्रह्म परमेश्वर हैं॥ ६॥
सम्बन्ध—उन्हीं परब्रह्मका अब अदितिदेवीके रूपसे वर्णन करते हैं—