य: सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत् परम्।
अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतॸ शकेमहि॥ २॥
ईजानानाम्=यज्ञ करनेवालोंके लिये; य: सेतु:=जो दु:खसमुद्रसे पार पहुँचा देनेयोग्य सेतु है; [तम्] नाचिकेतम्=उस नाचिकेत-अग्निको (और); पारम् तितीर्षताम्=संसार-समुद्रसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये; यत् अभयम्=जो भयरहित पद है; [तत् ] अक्षरम्=उस अविनाशी; परम् ब्रह्म=परब्रह्म पुरुषोत्तमको; शकेमहि=जानने और प्राप्त करनेमें भी हम समर्थ हों॥ २॥
व्याख्या—यमराज कहते हैं कि हे परमात्मन्! आप हमें वह सामर्थ्य दीजिये, जिससे हम निष्कामभावसे यज्ञादि शुभकर्म करनेकी विधिको भलीभाँति जान सकें और आपके आज्ञापालनार्थ उनका अनुष्ठान करके आपकी प्रसन्नता प्राप्त कर सकें तथा जो संसार-समुद्रसे पार होनेकी इच्छावाले विरक्त पुरुषोंके लिये निर्भय पद है, उस परम अविनाशी आप परब्रह्म पुरुषोत्तमभगवान्को भी जानने और प्राप्त करनेके योग्य बन जायँ।
इस मन्त्रमें यमराजने परमात्मासे उन्हें जाननेकी शक्ति प्रदान करनेके लिये प्रार्थना करके यह भाव दिखलाया है कि परब्रह्म पुरुषोत्तमको जानने और प्राप्त करनेका सबसे उत्तम और सरल साधन उनसे प्रार्थना करना ही है॥ २॥
सम्बन्ध—अब, उस परब्रह्म पुरुषोत्तमके परमधाममें किन साधनोंसे सम्पन्न मनुष्य पहुँच सकता है, यह बात रथ और रथीके रूपककी कल्पना करके समझायी जाती है—