यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो
यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत्।
योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो
नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते॥ २९॥
मृत्यो=हे यमराज; यस्मिन्=जिस; महति साम्पराये=महान् आश्चर्यमय परलोकसम्बन्धी आत्मज्ञानके विषयमें; इदम् विचिकित्सन्ति=(लोग) यह शङ्का करते हैं कि यह आत्मा मरनेके बाद रहता है या नहीं; (तत्र) यत् =उसमें जो निर्णय है; तत् न: ब्रूहि=वह आप हमें बतलाइये; य: अयम्=जो यह; गूढम् अनुप्रविष्ट: वर:=अत्यन्त गम्भीरताको प्राप्त हुआ वर है; तस्मात् =इससे; अन्यम्=दूसरा वर; नचिकेता:=नचिकेता; न वृणीते=नहीं माँगता॥ २९॥
व्याख्या—नचिकेता कहता है—‘हे यमराज ! जिस आत्मतत्त्वसम्बन्धी महान् ज्ञानके विषयमें लोग यह शङ्का करते हैं कि मरनेके बाद आत्माका अस्तित्व रहता है या नहीं, उसके सम्बन्धमें निर्णयात्मक जो आपका अनुभूत ज्ञान हो, मुझे कृपापूर्वक उसीका उपदेश कीजिये। यह आत्मतत्त्वसम्बन्धी वर अत्यन्त गूढ़ है—यह सत्य है; पर आपका शिष्य यह नचिकेता इसके अतिरिक्त दूसरा कोई वर नहीं चाहता’॥ २९॥