ॐ उशन् ह वै वाजश्रवस: सर्ववेदसं ददौ। तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस॥ १॥
ॐ=ॐ इस सच्चिदानन्दघन परमात्माके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ करते हैं; ह वै=प्रसिद्ध है कि; उशन्=यज्ञका फल चाहनेवाले; वाजश्रवस:=वाजश्रवाके पुत्र (उद्दालक) ने; सर्ववेदसम्=(विश्वजित् यज्ञमें) अपना सारा धन; ददौ=(ब्राह्मणोंको) दे दिया; तस्य=उसका; नचिकेता=नचिकेता; नाम ह=नामसे प्रसिद्ध; पुत्र: आस=एक पुत्र था॥ १॥
व्याख्या—ग्रन्थके आरम्भमें परमात्माका स्मरण मङ्गलकारक है, इसलिये यहाँ सर्वप्रथम ‘ॐ कार’ का उच्चारण करके उपनिषद्का आरम्भ हुआ है। जिस समय भारतवर्षका पवित्र आकाश यज्ञधूम और उसके पवित्र सौरभसे परिपूर्ण रहता था, त्यागमूर्ति ऋषि-महर्षियोंके द्वारा गाये हुए वेदमन्त्रोंकी दिव्य ध्वनिसे सभी दिशाएँ गूँजती रहती थीं, उसी समयका यह प्रसिद्ध इतिहास है। गौतमवंशीय वाजश्रवात्मज महर्षि अरुणके पुत्र अथवा अन्नके प्रचुर दानसे महान् कीर्ति पाये हुए (वाज=अन्न, श्रव=उसके दानसे प्राप्त यश) महर्षि अरुणके पुत्र उद्दालक ऋषिने फलकी कामनासे विश्वजित् नामक एक महान् यज्ञ किया। इस यज्ञमें सर्वस्व दान करना पड़ता है। अतएव उद्दालकने भी अपना सारा धन ऋत्विजों और सदस्योंको दक्षिणामें दे दिया। उद्दालकजीके नचिकेता नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र था॥ १॥