तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाभि हैनॸ सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति॥ ६॥
तत्=वह परब्रह्म परमात्मा; तद्वनम्=(प्राणिमात्रका प्रापणीय होनेके कारण) ‘तद्वन’; नाम ह=नामसे प्रसिद्ध है; (अत:) तद्वनम्=वह आनन्दघन परमात्मा प्राणिमात्रकी अभिलाषाका विषय और सबका परम प्रिय है; इति=इस भावसे; उपासितव्यम्=उसकी उपासना करनी चाहिये; स: य:=वह जो भी साधक; एतत्=उस ब्रह्मको; एवम्=इस प्रकार (उपासनाके द्वारा); वेद=जान लेता है; एनम् ह=उसको नि:संदेह; सर्वाणि=सम्पूर्ण; भूतानि=प्राणी; अभि=सब ओरसे; संवाञ्छन्ति=हृदयसे चाहते हैं अर्थात् वह प्राणिमात्रका प्रिय हो जाता है॥ ६॥
व्याख्या—वह आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वर सभीका अत्यन्त प्रिय है। सभी प्राणी किसी-न-किसी प्रकारसे उसीको चाहते हैं, परंतु पहचानते नहीं; इसीलिये वे सुखके रूपमें उसे खोजते हुए दु:खरूप विषयोंमें भटकते रहते हैं, उसे पा नहीं सकते! इस रहस्यको समझकर साधकको चाहिये कि उस परब्रह्म परमात्माको प्राणिमात्रका प्रिय समझकर उसके नित्य अचल अमल अनन्त परम आनन्दस्वरूपका नित्य-निरन्तर चिन्तन करता रहे। ऐसा करते-करते जब वह आनन्दस्वरूप सर्वप्रिय परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है, तब वह स्वयं भी आनन्दमय हो जाता है। अत: जगत्के सभी प्राणी उसे अपना परम आत्मीय समझकर उसके साथ हृदयसे प्रेम करने लगते हैं॥ ६॥