तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् कोऽसीति। वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति॥ ८॥
तत्=उसके समीप; अभ्यद्रवत्=(वायुदेवता) दौड़कर गया; तम्=उससे (भी); अभ्यवदत्=(उस दिव्य यक्षने) पूछा; क: असि इति=(कि तुम) कौन हो; अब्रवीत्=(तब वायुने) यह कहा (कि); अहम्=मैं; वै वायु:=प्रसिद्ध वायुदेव; अस्मि इति=हूँ; (और) अहम् वै=मैं ही; मातरिश्वा=मातरिश्वाके नामसे; अस्मि इति=प्रसिद्ध हूँ॥ ८॥
व्याख्या—वायुदेवताने सोचा, ‘अग्नि कहीं भूल कर गये होंगे; नहीं तो यक्षका परिचय जानना कौन बड़ी बात थी। अस्तु, इस सफलताका श्रेय मुझीको मिलेगा।’ यह सोचकर वे तुरंत यक्षके समीप जा पहुँचे। उन्हें अपनेसमीप खड़ा देखकर यक्षने पूछा—‘आप कौन हैं? वायुने भी अपने गुण-गौरवके गर्वसे तमककर उत्तर दिया ‘मैं प्रसिद्ध वायु हूँ, मेरा ही गौरवमय और रहस्यपूर्ण नाम मातरिश्वा है’॥ ८॥
सम्बन्ध—यक्षरूपी ब्रह्मने वायुसे पूछा—