मंगलाचरण
1. उन परमानन्दस्वरूप उपदेष्टा, ईश्वर, व्यापक और समस्त लोकोंके कारण श्रीहरिको मैं नमस्कार करता हूँ।
ग्रन्थका प्रयोजन
2. अपरोक्षानुभूति मोक्ष-सिद्धिके लिये कही जाती है। सत्पुरुषोंको (इसे) प्रयत्नपूर्वक बारम्बार विचारना चाहिये।
साधन-चतुष्टय
3. अपने वर्णाश्रमधर्म और तपस्याद्वारा श्रीहरिको प्रसन्न करनेसे मनुष्योंको वैराग्यादि साधन-चतुष्टयकी प्राप्ति होती है।
4. ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त विषयोंमें जो काकविष्ठाके समान वैराग्य होना है वही निर्मल वैराग्य है।
5. आत्माका स्वरूप नित्य है और दृश्य उसके विपरीत (अनित्य) है-ऐसा जो दृढ़ निश्चय है वही आत्मवस्तुका विवेक है।
6. वासनाओंका सर्वदा त्याग करना शम कहलाता है और बाह्य-वृत्तियोंका रोकना दम कहा जाता है।
7. विषयोंसे पराङ्मुख होना ही परम उपरति है और सम्पूर्ण दुःखोंका सहन करना शुभ तितिक्षा मानी गयी है।
8. शास्त्र और आचार्यके वाक्योंमें भक्ति रखना श्रद्धा है और अपने वास्तविक लक्ष्यमें चित्तकी एकाग्रता ही समाधान कहलाता है।
9. ‘प्रभो! मेरी संसारबन्धनसे कब और किस प्रकार मुक्ति होगी ?’ ऐसी जो सुदृढ़ बुद्धि है उसीको मुमुक्षुता कहना चाहिये।
विचारका प्रकार
10. उपर्युक्त साधनोंसे युक्त अपने शुभकी इच्छावाले पुरुषको ही ज्ञानप्राप्तिके लिये विचार करना चाहिये।
11. क्योंकि जिस प्रकार प्रकाशके बिना कभी पदार्थका भान नहीं होता उसी प्रकार बिना विचारके और किसी साधनसे ज्ञान नहीं हो सकता।
12. ‘मैं कौन हूँ? यह (जगत्) किस प्रकार उत्पन्न हुआ ? इसका कर्ता कौन है ? तथा इसका उपादान कारण क्या है?’ वह विचार इस प्रकारका होता है।
13. ‘मैं भूतोंका संघातरूप देह नहीं हूँ और न इन्द्रियसमूह ही हूँ, बल्कि इनसे भिन्न ही कोई हूँ’ वह विचार इस प्रकारका होता है।
14. ‘सम्पूर्ण प्रपंच अज्ञानजन्य है, यह ज्ञान होनेपर लीन हो जाता है। नाना प्रकारका संकल्प ही इसका कर्ता है’ वह विचार इस प्रकारका होता है।
15. ‘जैसे घटादिका उपादान कारण मृत्तिका है वैसे ही इन (अज्ञान और संकल्प) दोनोंका उपादान एक सूक्ष्म अविनाशी सत् है’ वह विचार इस प्रकारका होता है।
16. ‘मैं भी, जो केवल एक सूक्ष्म ज्ञाता साक्षी सत् और अविनाशी है, वही हूँ – इसमें सन्देह नहीं’ वह विचार इस प्रकारका होता है।
आत्मानात्मविवेक
17. आत्मा कलाहीन और एक है तथा देह अनेक तत्त्वोंसे गठित है; इन दोनोंकी जो एकता देखते हैं इससे बढ़कर और क्या अज्ञान होगा?
18. आत्मा नियामक और अन्तर्वर्ती है तथा देह बाह्य और नियम्य है; इन दोनोंकी जो एकता देखते हैं इससे बढ़कर और क्या अज्ञान होगा ?
19. आत्मा ज्ञानस्वरूप और पवित्र है तथा देह मांसमय और अपवित्र है; इन दोनोंकी जो एकता देखते हैं इससे बढ़कर और क्या अज्ञान होगा ?
20. आत्मा सबका प्रकाशक और निर्मल है तथा देह तमोमय कहा जाता है; इन दोनोंकी जो एकता देखते हैं इससे बढ़कर और क्या अज्ञान होगा ?
21. आत्मा नित्य और सत्स्वरूप है तथा देह अनित्य और असत् है; इन दोनोंकी जो एकता देखते हैं इससे बढ़कर और क्या अज्ञान होगा ?
22. पदार्थोंकी जो प्रतीति होती है उसमें आत्माका ही प्रकाशकत्व है। किन्तु आत्मज्योति अग्नि आदिकी ज्योतिके समान नहीं है, क्योंकि उनके अभावमें तो रात्रिके समय अन्धकार हो जाता है (परन्तु आत्मज्योतिका कभी अभाव नहीं होता)।
23. घटद्रष्टाके समान सर्वदा यह जानते हुए भी कि ‘यह मेरा है’ अहो! मूढ पुरुष ‘मैं देह हूँ’ ऐसा मानता रहता है।
ज्ञानका स्वरूप
24. मैं सम, शान्त और सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म ही हूँ, असत्स्वरूप देह मैं नहीं हूँ – इसीको बुधजन ज्ञान कहते हैं।
25. मैं निर्विकार, निराकार, निर्मल और अविनाशी हूँ; असत्स्वरूप देह मैं नहीं हूँ – इसीको बुधजन ज्ञान कहते हैं।
26. मैं दुःखहीन, आभासहीन, विकल्पहीन और व्यापक हूँ; असत्स्वरूप देह मैं नहीं हूँ – इसीको बुधजन ज्ञान कहते हैं।
27. मैं निर्गुण, निष्क्रिय, नित्य, नित्यमुक्त और अच्युत हूँ; असत्स्वरूप देह मैं नहीं हैं – इसीको बुधजन ज्ञान कहते हैं।
28. मैं निर्मल, निश्चल, अनन्त, शुद्ध और अजर-अमर हूँ; असत्स्वरूप देह मैं नहीं हूँ-इसीको बुधजन ज्ञान कहते हैं।
ज्ञानोपदेश
29. रे मूर्ख ! अपने शरीरमें पुरुष नामक सुन्दर देहातीत और शास्त्रसम्मत आत्माके रहते हुए भी तू उसे शून्यरूप क्यों करता है?
30. रे मूर्ख ! जो तुझ जैसोंको बड़ी कठिनतासे दिखलायी पड़ सकता है उस अपने देहातीत सत्स्वरूप आत्मपुरुषका श्रुति और युक्तिपूर्वक श्रवण कर।
31. अहं (मैं) शब्दसे प्रसिद्ध परात्मा एकमात्र स्थित है। (अर्थात् वह अनेक तत्त्वोंका संघात नहीं है) फिर, जो स्थूल है और अनेक भावोंको प्राप्त हो रहा है वह देह पुरुष कैसे हो सकता है ?
32. अहं द्रष्टारूपसे सिद्ध है और शरीर, ‘मेरा है’ ऐसा कहा जानेके कारण दृश्यरूपसे स्थित है; फिर यह देह पुरुष कैसे हो सकता है?
33. अहं विकाररहित है और देह सर्वदा विकारवान् है- यह स्पष्ट प्रतीत होता है; फिर यह देह पुरुष कैसे हो सकता है ?
34. चतुर मनुष्योंने पुरुषका लक्षण ‘यस्मात्परम् *’ इत्यादि श्रुतिसे निश्चित किया है, फिर यह देह पुरुष कैसे हो सकता है? (* जिससे पर या अपर तथा अणु या दीर्घ कुछ भी नहीं है और जो एक ही दिव्यधाममें वृक्षके समान निष्कम्पभावसे स्थित है उस पुरुषसे ही यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त है।)
35. जब कि श्रुतिने पुरुषसूक्तमें भी कहा है कि ‘सब कुछ पुरुष ही है’ तो फिर यह देह पुरुष कैसे हो सकता है ?
36. बृहदारण्यकमें भी पुरुषको असंग कहा गया है; फिर अनन्त मलसे पूर्ण यह देह पुरुष कैसे हो सकता है?
37. वहीं यह भी बतलाया है कि पुरुष स्वयंप्रकाश है; फिर यह परप्रकाश्य जड देह पुरुष कैसे हो सकता है?
38. कर्मकाण्डमें भी आत्माको देहसे पृथक् और नित्य ही बतलाया गया है। इसीसे वह देहपातके अनन्तर अपने कर्मोंका फल भोगता है।
39. लिंग (सूक्ष्म) देह भी अनेक तत्त्वोंका संघात, चलायमान, दृश्य, विकारी, अव्यापक और असत्स्वरूप है; वह भी पुरुष कैसे हो सकता है?
40. इस प्रकार आत्मा पुरुष या ईश्वर (स्थूल-सूक्ष्म) दोनों प्रकारके शरीरोंसे भिन्न है। अतः मैं सर्वात्मा, सर्वरूप, अविनाशी और सबसे परे हूँ।
द्वैत-मिथ्यात्व
41. शंका – इस प्रकार आत्मा और देहका भेद माननेसे भी, जैसी कि तर्कशास्त्रने भी प्रतिपादन की है, प्रपंचकी सत्यता तो रहती ही है; इससे क्या पुरुषार्थ सिद्ध हुआ ?
42. समाधान – यहाँतक आत्मा और देहका भेद दिखलाकर देहात्मभावका निराकरण किया गया है; अब देहभेदके असत्यत्वका स्पष्ट वर्णन किया जाता है।
43. चैतन्य एकरूप है अतः उसका भेद किसी प्रकार उचित नहीं हो सकता। इस प्रकार जैसे रज्जुमें सर्पकी प्रतीति मिथ्या है उसी तरह जीवभावको भी मिथ्या जानना चाहिये।
44. रज्जुके अज्ञानसे जैसे एक क्षणमें ही वह सर्पिणी प्रतीत होने लगती है वैसे ही साक्षात् शुद्ध चिति ही विश्वरूपसे भास रही है।
45. प्रपंचका उपादानकारण ब्रह्मके अतिरिक्त और कोई नहीं है, अतः यह सम्पूर्ण प्रपंच ब्रह्म ही है और कुछ नहीं।
46. शास्त्र कहता है कि सब कुछ आत्मा ही है, इसलिये (जगत् और ब्रह्मका) व्याप्य-व्यापकभाव मिथ्या है। इस परमतत्त्वके जान लेनेपर फिर भेदका अवसर ही कहाँ रहता है?
47. श्रुतिने स्वयं ही नानात्वका निषेध किया है। कारणके अद्वितीय होनेपर भला अन्य आभास कैसे हो सकता है?
48. ‘मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है’ ऐसा कहकर श्रुतिने (नानात्वदर्शनमें) दोष भी बतलाया है। मनुष्य मायासे ठगा जाकर ही संसारमें नानात्व देखता है।
49. सम्पूर्ण भूत परमात्मा ब्रह्मसे ही उत्पन्न होते हैं, अतः ये सब ब्रह्म ही हैं – ऐसा निश्चय करना चाहिये।
50. समस्त नाम, विविध रूप और सम्पूर्ण कर्मोंको ब्रह्म ही धारण करता है – ऐसा श्रुतिने कहा है।
51. जिस प्रकार सुवर्णनिर्मित वस्तुओंकी सुवर्णता निरन्तर रहती है, उसी प्रकार ब्रह्मसे उत्पन्न हुए पदार्थोंकी ब्रह्मता भी नित्य है।
52. जो मूढ जीवात्मा और परमात्मामें थोड़ा-सा भी अन्तर करता है उसके लिये श्रुतिने भय बतलाया है।
53-54. जहाँ अज्ञानसे द्वैतभाव होता है वहीं कोई और दिखलायी देता है; जब सब आत्मरूप ही दिखलायी देता है तब अन्य कुछ भी नहीं रहता। उस अवस्थामें सम्पूर्ण भूतोंको आत्मभावसे जाननेवाले उस (महात्मा)-को, कोई दूसरा न रहनेके कारण न मोह होता है और न शोक ही।
55. क्योंकि यह आत्मा सर्वात्मभावसे स्थित हुआ ब्रह्म ही है-ऐसा बृहदारण्यशाखाकी श्रुतिने निश्चय किया है।
प्रपंचका मिथ्यात्व
56. दूसरे क्षणमें न रहनेके कारण जैसे स्वप्न असत् है वैसे ही यह संसार व्यवहारयोग्य और अनुभव होता हुआ भी असत् है।
57. जागृतिमें स्वप्न अलीक हो जाता है, स्वप्नमें जागृति नहीं रहती तथा सुषुप्तिमें (जागृति और स्वप्न) दोनों नहीं रहते और इन दोनोंमें सुषुप्ति नहीं रहती।
58. इस प्रकार सत्, रज, तम – इन तीन गुणोंसे उत्पन्न हुई ये तीनों अवस्थाएँ मिथ्या हैं, किन्तु इन तीनोंका द्रष्टा गुणोंसे परे नित्य एक और चित्स्वरूप है।
59. जिस प्रकार मनुष्य भ्रमवश मिट्टीमें घड़ा और सीपीमें चाँदी देखता है उसी प्रकार वह भ्रमसे ही ब्रह्ममें जीवभाव देखता है, स्वतः नहीं।
60. जिस प्रकार मिट्टीमें घड़ा, सुवर्णमें कुण्डल और सीपीमें चाँदी नाममात्रको ही हैं उसी प्रकार परब्रह्ममें जीव शब्द भी नाममात्र ही है।
61. जिस प्रकार आकाशमें नीलता, मरुभूमिमें जल और ठूंठमें पुरुषकी प्रतीति होती है उसी प्रकार चेतन आत्मामें विश्व भासता है।
62. जैसी शून्यमें वैताल और गन्धर्वनगरकी तथा आकाशमें दो चन्द्रमाओंकी स्थिति है वैसी ही सत्में संसारकी स्थिति है।
63. जैसे तरंगमालाओंके रूपसे सर्वथा जल और पात्ररूपसे ताँबा ही स्फुरित होता है वैसे ही ब्रह्माण्डसमूहके रूपमें आत्मा ही स्फुरित हो रहा है।
64. जिस प्रकार घट-नामसे पृथ्वी और पट-नामसे तन्तु भासते हैं उसी प्रकार जगत्-नामसे चित्-शक्ति भास रही है; उस (जगत्) – का बाध करके उसे जानना चाहिये।
ब्रह्मकी सर्वात्मकता
65. मनुष्योंके द्वारा जितना व्यवहार होता है वह सब ब्रह्महीकी सत्तासे होता है, किन्तु वे अज्ञानवश यह नहीं जानते। वास्तवमें घड़ा आदि सब मृत्तिका ही तो हैं।
66. जिस प्रकार घट और मृत्तिकाकी कार्य-कारणता नित्य है उसी प्रकार श्रुति और युक्तिसे प्रपंच और ब्रह्मकी भी है। अर्थात् जैसे घटादिमें कारणरूपसे मृत्तिका सदैव रहती है वैसे ही ब्रह्म भी संसारमें सदा सर्वत्र विद्यमान है।
67. जिस प्रकार ग्रहण किये जानेवाले घड़ेमें मिट्टी बलात् प्रतीत होती है वैसे ही दिखायी देनेवाले प्रपंचमें भी ब्रह्म ही स्पष्ट भासता है।
68. आत्मा नित्य शुद्ध है फिर भी वह सर्वदा अशुद्ध प्रतीत होता है; जैसे कि एक ही रज्जु ज्ञानी और अज्ञानीको सदा दो प्रकारसे भासती है।
69. जिस प्रकार घड़ा मिट्टीरूप होता है उसी प्रकार देह भी चेतनरूप है। अज्ञानीजन व्यर्थ ही यह आत्मा और अनात्माका विभाग करते हैं।
देहात्मताका निषेध
70. जिस प्रकार (अज्ञानवश) सर्परूपसे रज्जुका और चाँदीरूपसे सीपीका निश्चय कर लिया जाता है उसी प्रकार मूढ पुरुषोंद्वारा आत्माका देहरूपसे निश्चय किया हुआ है।
71. जैसे घटरूपसे पृथ्वी और पटरूपसे तन्तुओंका निश्चय होता है, वैसे ही मूढ पुरुषोंद्वारा आत्माका देहरूपसे निश्चय किया हुआ है।
72. जैसे कुण्डलरूपसे सुवर्ण और तरंगरूपसे जलकी कल्पना होती है, वैसे ही मूढ पुरुषोंद्वारा आत्माका देहरूपसे निश्चय किया हुआ है।
73. जिस प्रकार चोररूपसे स्थाणु (ठूंठ) का और जलरूपसे मरुस्थलका निश्चय किया जाता है उसी प्रकार मूढ पुरुषोंद्वारा देहरूपसे आत्माका निश्चय किया हुआ है।
74. जिस प्रकार काष्ठका गृहरूपसे और लोहेका खड्गरूपसे निश्चय किया जाता है उसी प्रकार मूढ पुरुषोंद्वारा आत्माका देहरूपसे निश्चय किया हुआ है।
75. जैसे जलके कारण किसीको वृक्ष उलटा दिखलायी पड़ता हो उसी प्रकार अज्ञानके कारण मनुष्य आत्मामें देहभाव देखता है।
76. जहाजमें जानेवाले पुरुषको जैसे सब पदार्थ चलते हुए दिखलायी देते हैं वैसे ही अज्ञानके कारण मनुष्य आत्मामें देहभाव देखता है।
77. जिस प्रकार नेत्रदोषके कारण किसीको श्वेत वस्तुओंमें पीलापन दीख पड़ता है उसी प्रकार अज्ञानके कारण मनुष्य आत्मामें देहभाव देखता है।
78. जैसे घूमती हुई आँखोंसे सब चीजें चक्कर काटती हुई दिखलायी देती हैं वैसे ही अज्ञानके कारण मनुष्य आत्मामें देहभाव देखता है।
79. जिस प्रकार अलात (जलती हुई बनैती) घुमानेसे ही सूर्यके समान गोलाकार प्रतीत होता है उसी प्रकार अज्ञानके कारण मनुष्य आत्मामें देहभाव देखता है।
80. जैसे अत्यन्त दूरीके कारण सब वस्तुएँ बड़ी होती हुई भी छोटी दिखलायी पड़ती हैं वैसे ही अज्ञानके कारण मनुष्य आत्मामें देहभाव देखता है।
81. तथा जिस प्रकार उपनेत्र (सूक्ष्मवीक्षण) से सब वस्तुएँ छोटी होनेपर भी बड़ी दीख पड़ती हैं उसी प्रकार अज्ञानके कारण मनुष्य आत्मामें देहभाव देखता है।
82. जैसे काँचकी भूमिमें जल और जलमें काँचका भ्रम हो जाता है, वैसे ही अज्ञानके कारण मनुष्य आत्मामें देहभाव देखता है।
83. जैसे कोई पुरुष अग्निमें मणि और मणिमें अग्निबुद्धि कर ले, वैसे ही अज्ञानके कारण मनुष्य आत्मामें देहभाव देखता है।
84. जिस प्रकार बादलोंके दौड़नेपर चन्द्रमा दौड़ता हुआ प्रतीत होता है उसी प्रकार अज्ञानके कारण मनुष्य आत्मामें देहभाव देखता है।
85. जैसे किसीको मोहवश (भूलसे) दिग्भ्रम हो जाता है, वैसे ही अज्ञानके कारण मनुष्य आत्मामें देहभाव देखता है।
86. जैसे किसीको जलमें चन्द्रमा हिलता हुआ दिखलायी दे उसी प्रकार अज्ञानके कारण मनुष्य आत्मामें देहभाव देखता है।
87. इस प्रकार अविद्याके कारण आत्मामें देहाध्यास होता है; वही आत्मा ज्ञान हो जानेपर परमात्मामें लीन हो जाता है।
88. जब समस्त स्थावर-जंगम जगत्को आत्मरूपसे जान लिया तब सम्पूर्ण भावोंका अभाव हो जानेपर देहोंका आत्मत्व ही कहाँ रह सकता है ?
89. हे महामते ! आत्मस्वरूपको निरन्तर जानते हुए अपने सम्पूर्ण प्रारब्धका भोग करते हुए काल व्यतीत कर; तुझे उद्विग्न न होना चाहिये। (BG 12.15)
प्रारब्धका निराकरण
90. शास्त्रमें जो ऐसा सुना जाता है कि आत्मज्ञान हो जानेपर भी प्रारब्ध नहीं छोड़ता, उसका अब निराकरण (खण्डन) किया जाता है।
91. जाग पड़नेपर जैसे स्वप्न नहीं रहता वैसे ही देहादि असत्य होनेके कारण ज्ञानोदयके पश्चात् प्रारब्ध नहीं रहता।
92. जन्मान्तरमें किया हुआ कर्म ही प्रारब्ध कहलाता है, अतः (ज्ञानीकी दृष्टिमें) जन्मान्तरका अभाव होनेसे वह किसी अवस्थामें नहीं है।
93. जिस प्रकार स्वप्नशरीर अध्यस्त है उसी प्रकार यह देह भी है; अध्यस्तका जन्म कैसे हो सकता है? और जन्म न होनेपर प्रारब्ध भी कहाँसे होगा ?
94. घड़ेके उपादान-कारण मिट्टीके समान वेदान्तग्रन्थोंमें अज्ञानको प्रपंचका उपादान-कारण बतलाया है; (ज्ञानसे) उसका नाश हो जानेपर फिर विश्व कहाँ ठहर सकता है?
95. जिस प्रकार मनुष्य भ्रमवश रस्सीके स्थानमें सर्प देखता है उसी प्रकार सत्यको न जाननेपर ही मूढबुद्धि संसारको देखता है।
96. जैसे रस्सीका रूप जान लेनेपर सर्पभ्रम नहीं रहता उसी प्रकार अधिष्ठान (ब्रह्म) को जान लेनेपर प्रपंच शून्यरूप हो जाता है।
97. देह भी प्रपंच ही है तो फिर प्रारब्ध कहाँ रह सकता है? बस, अज्ञानियोंको समझानेके लिये ही श्रुति प्रारब्ध बतलाती है।
98. क्योंकि श्रुतिने ‘उस परावरके देख लेनेपर इसके (सम्पूर्ण) कर्म क्षीण हो जाते हैं’ इस वाक्यमें उस (प्रारब्ध) का निषेध करनेके लिये ही स्पष्टतया बहुवचनका प्रयोग किया है।
99. यदि अज्ञानीजन बलात् (ज्ञानीके) प्रारब्धका प्रतिपादन करेंगे तो इस (प्रारब्धरूप द्वैतके स्वीकार करने) से (मोक्षाभाव और ज्ञान-सम्प्रदायका उच्छेदरूप) दो अनर्थ उपस्थित होंगे तथा अद्वैत वेदान्त-सिद्धान्तकी भी हानि होगी। इसलिये (प्रारब्धका प्रतिपादन करनेवाली व्यावहारिक श्रुतियोंको छोड़कर) जिनसे ज्ञान प्राप्त हो उन्हीं श्रुतियोंको ग्रहण करना चाहिये।
निदिध्यासनके पंद्रह अंग
100. अब मैं पूर्वोक्त (ज्ञाननिष्ठा) की प्राप्तिके लिये पंद्रह अंग बतलाता हूँ। उन सबसे सर्वदा निदिध्यासन (अभ्यास) करना चाहिये।
101. निरन्तर अभ्यास किये बिना सच्चित्स्वरूप आत्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती। अतः जिज्ञासुको चाहिये कि कल्याण-प्राप्तिके लिये चिरकालतक ब्रह्मचिन्तन करे।
102-103. यम, नियम, त्याग, मौन, देश, काल, आसन, मूलबन्ध, देहकी समता, नेत्रोंकी स्थिति, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि – ये क्रमसे पंद्रह अंग बतलाये गये हैं।
104. ‘सब ब्रह्म ही है’ ऐसे ज्ञानसे इन्द्रियोंका वशीभूत हो जाना यम कहलाता है। इसका बारम्बार अभ्यास करना चाहिये।
105. सजातीय वृत्तिका प्रवाह और विजातीयका तिरस्कार – यही परमानन्दरूप नियम है। बुद्धिमान् लोग इसका नियमपूर्वक पालन करते हैं।
106. प्रपंचको चेतनस्वरूप देखनेसे उसके रूपका त्याग करना ही महान् पुरुषोंका वन्दनीय त्याग है, क्योंकि वह तुरन्त मोक्ष देनेवाला है।
107. जिसे न पाकर मनसहित वाणी लौट आती है तथा जिस मौनतक योगियोंकी ही गति है विद्वान् सदा उसीको धारण करे।
108. जहाँसे वाणी लौट आती है उस (ब्रह्म) का भला कौन वर्णन कर सकता है ? और यदि प्रपंचको ही वक्तव्य (शब्दका विषय) मानें तो वह भी शब्दरहित है।
109. अतः सत्पुरुषोंका दूसरा स्वाभाविक मौन यह (प्रपंचका अशब्दत्व) भी हो सकता है। ब्रह्मवादियोंने वाणीका मौन तो मूर्खौंके लिये बतलाया है।
110. जिसमें आदि, अन्त और मध्यमें कोई भी जन नहीं है तथा जिससे यह जगत् निरन्तर व्याप्त है वही देश जनशून्य कहा गया है।
111. ब्रह्मा आदि समस्त भूतोंकी एक पलमें ही कलना करनेके कारण अद्वितीय अखण्डानन्दरूप ब्रह्म ही कालशब्दसे कहा जाता है।
112. जिस अवस्थामें सुखपूर्वक निरन्तर ब्रह्मचिन्तन हो सके उसे ही आसन जानना चाहिये; दूसरा सुखनाशक आसन आसन नहीं है।
113. जो समस्त भूतोंका आदिकारण है, विश्वका अविनाशी अधिष्ठान है और जिसमें सिद्धजन स्थित रहते हैं उसे ही सिद्धासन समझना चाहिये।
114. जो समस्त भूतोंका मूल है और जिसके आश्रयसे चित्त स्थिर किया जाता है उस मूलबन्धका सदा सेवन करना चाहिये। यही राजयोगियोंका योग है।
115. जिस समय चित्त सम ब्रह्ममें लीन हो जाय उसी समय अंगोंकी समता समझनी चाहिये। अन्यथा सूखे वृक्षके समान अंगोंकी निश्चलताका नाम समता नहीं है।
116. दृष्टिको ज्ञानमयी करके संसारको ब्रह्ममय देखे। यही दृष्टि अति उत्तम है; नासिकाके अग्रभागको देखनेवाली नहीं।
117. जहाँ द्रष्टा, दर्शन और दृश्य (इस त्रिपुटी) का अभाव हो जाता है वहीं दृष्टि करनी चाहिये, नासिकाके अग्रभागपर नहीं।
118. चित्तादि समस्त भावोंमें ब्रह्मरूपसे ही भावना करनेसे सम्पूर्ण वृत्तियोंका निरोध हो जाता है। वही प्राणायाम कहलाता है।
119. प्रपंचका निषेध करना रेचक-प्राणायाम है और ‘मैं ब्रह्म ही हूँ’ ऐसी जो वृत्ति है वह पूरक-प्राणायाम कहलाता है।
120. फिर उस (ब्रह्माकार) वृत्तिकी निश्चलता ही कुम्भक-प्राणायाम है। जाग्रत् पुरुषोंके लिये तो यही क्रम है, अज्ञानियोंके लिये घ्राणपीडन ही प्राणायाम है।
121. विषयोंमें आत्मभाव करके मनको चेतनमें डुबो देनेको ही प्रत्याहार जानना चाहिये। मुमुक्षुजन इसीका अभ्यास करें।
122. मन जहाँ-जहाँ जाय वहीं-वहीं ब्रह्मका साक्षात्कार करते हुए मनको स्थिर करना ही उत्तम धारणा मानी गयी है।
123. ‘मैं ब्रह्म ही हूँ’ इस सवृत्तिसे जो परमानन्ददायिनी निरालम्ब स्थिति होती है वही ‘ध्यान’ शब्दसे प्रसिद्ध है।
124. निर्विकार तथा ब्रह्माकारवृत्तिसे जो पूर्णतया वृत्तिहीनता हो जाती है वही ज्ञानसमाधि है।
125. इस प्रकार इस स्वाभाविक आनन्दका तबतक भली प्रकार अभ्यास करे जबतक कि चित्तको लगानेपर एक क्षणमें ही वह अपने वशीभूत न हो जाय।
126. फिर वह योगिराज सब साधनोंसे छूटकर सिद्ध हो जाता है। वही उसका स्वरूप है; वह किसी एकके मन या वाणीका विषय नहीं है।
समाधिके विघ्न
127-128. समाधिका अभ्यास करनेपर अनुसन्धानराहित्य, आलस्य, भोग-वासना, लय, तम, विक्षेप, रसास्वाद और शून्यता आदि विघ्न बलात् अवश्य आते हैं। इस प्रकार जो अनेक विघ्न आते हैं, ब्रह्मवेत्ताको उन्हें धीरे-धीरे त्यागना चाहिये।
129. (समाधिके समय) भाववृत्ति रहनेसे भावत्व, शून्यवृत्ति रहनेसे शून्यत्व और पूर्णवृत्ति रहनेसे पूर्णत्वकी प्राप्ति होती है। अतः पूर्णत्वकाअभ्यास करे।
ब्राह्मी वृत्तिका महत्त्व
130. जो लोग इस परम पवित्र ब्राह्मी वृत्तिका त्याग करते हैं वे वृथा ही जीते हैं, तथा वे पशुओंके समान हैं।
131. जो इस वृत्तिको जानते हैं और जानकर बढ़ाते भी हैं वे ही सत्पुरुष हैं तथा वे ही त्रिलोकीमें धन्य और वन्दनीय भी हैं।
132. जिनकी यह ब्राह्मी वृत्ति बढ़ी हुई और परिपक्व होती है वे ही अति श्रेष्ठ ब्रह्मभावको प्राप्त होते हैं, केवल शब्दसे ही कहनेवाले अन्य पुरुष नहीं।
133. जो ब्रह्मवार्तामें कुशल हैं किन्तु ब्राह्मी वृत्तिसे रहित और रागयुक्त हैं, निश्चय ही वे अत्यन्त अज्ञानी हैं और बारम्बार जन्मते-मरते रहते हैं।
134. ब्रह्मादि (लोकपालों), सनकादि (सिद्धों) और शुकदेवादि (परमहंसों)-के समान वे आधे पल भी ब्रह्ममयी वृत्तिके बिना नहीं रहते।
वृत्तिज्ञानका साधन
135. कार्यमें कारण अनुगत होता है, कारणमें कार्य अनुगत नहीं होता। अतः विचार करनेसे कार्यका अभाव होनेके कारण कारणकी कारणता भी नहीं रहती।
136. इस प्रकार जो वाणीका अविषय है वह वस्तु शुद्ध है। इसका बारम्बार मिट्टी और घड़ेके दृष्टान्तसे ही विचार करना चाहिये।
137. इसी प्रकारसे वृत्ति ब्रह्मात्मिका हो जाती है और फिर उन शुद्धचित्त पुरुषोंके अन्तःकरणमें वृत्तिज्ञान उदय होता है।
138. पुरुषको चाहिये कि पहले वह कारणको (कार्यसे) अलग करके देखे, पीछे वह सर्वदा उसे कार्यमें अनुगतरूपसे देखने लगता है।
139. पहले कार्यहीमें कारणको देखे और फिर कार्यको त्याग दे। इस प्रकार कारणताका नाश हो जाता है और मुनि (कार्य-कारणतासे रहित) अवशिष्टरूप हो जाता है।
140. जिस वस्तुका निश्चयपूर्वक तीव्र वेगसे चिन्तन किया जाता है – पुरुष तुरंत वही हो जाता है – यह बात भृंगी कीड़ेके दृष्टान्तसे जाननी चाहिये।
141. यह सम्पूर्ण जगत् अदृश्य भावरूप चेतनमय है, इस प्रकार बुद्धिमान् पुरुष सावधान होकर नित्यप्रति अपने आत्माका चिन्तन करे।
142. विद्वान्को चाहिये कि दृश्यको अदृश्य करके उसका ब्रह्मरूपसे चिन्तन करे और चिद्रसपूर्ण बुद्धिसे नित्य सुखमें मग्न रहे।
143-144. इन सब अंगोंसे युक्त योगका नाम राजयोग है। जिनकी वासनाएँ कुछ कम क्षीण हुई होती हैं उन्हें यह हठयोगके सहित और जिनका चित्त परिपक्व (वासनाहीन) होता है उन्हें अकेला ही सिद्धि देनेवाला होता है। यह सभी गुरु और ईश्वरके भक्तोंको तुरंत सुगमतासे प्राप्त हो सकता है।