यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वत:॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:।
यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते॥
तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥
यत्र, उपरमते, चित्तम्, निरुद्धम्, योगसेवया,
यत्र, च, एव,आत्मना,आत्मानम्, पश्यन्, आत्मनि, तुष्यति॥ २०॥
सुखम्, आत्यन्तिकम्, यत्, तत्, बुद्धिग्राह्यम्, अतीन्द्रियम्,
वेत्ति, यत्र, न, च, एव, अयम्, स्थित:, चलति, तत्त्वत:॥ २१॥
यम्, लब्ध्वा, च, अपरम्, लाभम्, मन्यते, न, अधिकम्, तत:,
यस्मिन्, स्थित:, न, दु:खेन, गुरुणा, अपि, विचाल्यते॥ २२॥
तम्, विद्यात्, दु:खसंयोगवियोगम्, योगसञ्ज्ञितम्,
स:, निश्चयेन, योक्तव्य:, योग:, अनिर्विण्णचेतसा॥ २३॥
योगसेवया = योगके अभ्याससे, निरुद्धम् = निरुद्ध, चित्तम् = चित्त, यत्र = जिस अवस्थामें, उपरमते = उपराम हो जाता है, च = और, यत्र = जिस अवस्थामें (परमात्माके ध्यानसे शुद्ध हुई), आत्मना = सूक्ष्म बुद्धिद्वारा, आत्मानम् = परमात्माको, पश्यन् = साक्षात् करता हुआ, आत्मनि = सच्चिदानन्दघन परमात्मामें, एव = ही, तुष्यति = संतुष्ट रहता है।
अतीन्द्रियम् = इन्द्रियोंसे अतीत, बुद्धिग्राह्यम् = केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वारा ग्रहण करनेयोग्य, यत् = जो, आत्यन्तिकम् = अनन्त, सुखम् = आनन्द है, तत् = उसको, यत्र = जिस अवस्थामें, वेत्ति = अनुभव करता है, च = और, यत्र = जिस अवस्थामें, स्थित: = स्थित, अयम् = यह (योगी),तत्त्वत: = परमात्माके स्वरूपसे, न एव चलति = विचलित होता ही नहीं।
यम् = जिस, लाभम् = लाभको, लब्ध्वा = प्राप्त होकर, तत: = उससे, अधिकम् = अधिक, अपरम् = दूसरा (कुछ भी लाभ), न मन्यते = नहीं मानता, च = और (परमात्मप्राप्तिरूप), यस्मिन् = जिस अवस्थामें, स्थित: = स्थित (योगी), गुरुणा = बड़े भारी, दु:खेन = दु:खसे, अपि = भी, न विचाल्यते = चलायमान नहीं होता।
दु:खसंयोगवियोगम् = दु:खरूप संसारके संयोगसे रहित है (तथा), योगसञ्ज्ञितम् = जिसका नाम योग है, तम् = उसको, विद्यात् = जानना चाहिये, स: = वह, योग: = योग, अनिर्विण्णचेतसा = न उकताये हुए अर्थात् धैर्य और उत्साहयुक्त चित्तसे, निश्चयेन = निश्चयपूर्वक, योक्तव्य: = करना कर्तव्य है।
‘जब ध्यान के अभ्यास द्वारा मन पूर्णतः नियंत्रित कर लिया जाता है वह शान्ति प्राप्त करता है, और जब कोई स्व के द्वारा ‘स्व’ को देख लेता है, वह ‘स्व’ में संतुष्ट हो जाता है’।
‘जब कोई (शुद्धीकृत) बुद्धि द्वारा असीम आनन्द का अनुभव करता है, जो इन्द्रियों से अतीत या परे है, उसमें प्रतिष्ठित होकर वह अपनी वास्तविक स्थिति से कभी पृथक नहीं होता है’।
‘जिसे प्राप्त करके, कोई किसी भी अन्य उपलब्धि को उससे उच्चतर नहीं मानता है, और जिसमें प्रतिष्ठित होकर, कोई भारी दुःख द्वारा भी विचलित नहीं होता है’।
‘इस स्थिति को योग के नाम से जाना जाना चाहिये – दुख के साथ संपर्क विहीन स्थिति। इस योग का हृदय के अवसाद द्वारा विचलित हुए बिना लगन के साथ अभ्यास करना चाहिये’।
।।6.20।। व्याख्या–‘यत्रोपरमते चित्तं ৷৷. पश्यन्नात्मनि तुष्यति’–ध्यानयोगमें पहले ‘मनको केवल स्वरूपमें ही लगाना है’ यह धारणा होती है। ऐसी धारणा होनेके बाद स्वरूपके सिवाय दूसरी कोई वृत्ति पैदा हो भी जाय, तो उसकी उपेक्षा करके उसे हटा देने और चित्तको केवल स्वरूपमें ही लगानेसे जब मनका प्रवाह केवल स्वरूपमें ही लग जाता है, तब उसको ध्यान कहते हैं। ध्यानके समय ध्याता, ध्यान और ध्येय–यह त्रिपुटी रहती है अर्थात् साधक ध्यानके समय अपनेको ध्याता (ध्यान करनेवाला) मानता है, स्वरूपमें तद्रूप होनेवाली वृत्तिको ध्यान मानता है और साध्यरूप स्वरूपको ध्येय मानता है। तात्पर्य है कि जबतक इन तीनोंका अलग-अलग ज्ञान रहता है, तबतक वह ‘ध्यान’ कहलाता है। ध्यानमें ध्येयकी मुख्यता होनेके कारण साधक पहले अपनेमें ध्यातापना भूल जाता है। फिर ध्यानकी वृत्ति भी भूल जाता है। अन्तमें केवल ध्येय ही जाग्रत् रहता है। इसको ‘समाधि’ कहते हैं। यह ‘संप्रज्ञातसमाधि’ है जो चित्तकी एकाग्र अवस्थामें होती है। इस समाधिके दीर्घकालके अभ्याससे फिर ‘असंप्रज्ञात-समाधि’ होती है। इन दोनों समाधियोंमें भेद यह है कि जबतक ध्येय, ध्येयका नाम और नाम-नामीका सम्बन्ध–ये तीनों चीजें रहती हैं, तबतक वह ‘संप्रज्ञात-समाधि’ होती है। इसीको चित्तकी ‘एकाग्र’ अवस्था कहते हैं। परन्तु जब नामकी स्मृति न रहकर केवल नामी (ध्येय) रह जाता है, तब वह ‘असंप्रज्ञात-समाधि’ होती है। इसीको चित्तकी ‘निरुद्ध’ अवस्था कहते हैं।निरुद्ध अवस्थाकी समाधि दो तरहकी होती है–सबीज और निर्बीज। जिसमें संसारकी सूक्ष्म वासना रहती है, वह ‘सबीज समाधि’ कहलाती है। सूक्ष्म वासनाके कारण सबीज समाधिमें सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं। ये सिद्धियाँ सांसारिक दृष्टिसे तो ऐश्वर्य हैं, पर पारमार्थिक दृष्टिसे (चेतन-तत्त्वकी प्राप्तिमें) विघ्न हैं। ध्यानयोगी जब इन सिद्धियोंको निस्तत्त्व समझकर इनसे उपराम हो जाता है, तब उसकी ‘निर्बीज समाधि’ होती है, जिसका यहाँ (इस श्लोकमें)
‘निरुद्धम्’ पदसे संकेत किया गया है।ध्यानमें संसारके सम्बन्धसे विमुख होनेपर एक शान्ति, एक सुख मिलता है, जो कि संसारका सम्बन्ध रहनेपर कभी नहीं मिलता। संप्रज्ञात-समाधिमें उससे भी विलक्षण सुखका अनुभव होता है। इस संप्रज्ञात-समाधिसे भी असंप्रज्ञात-समाधिमें विलक्षण सुख होता है। जब साधक निर्बीज समाधिमें पहुँचता है, तब उसमें बहुत ही विलक्षण सुख, आनन्द होता है। योगका अभ्यास करते-करते चित्त निरुद्ध-अवस्था–निर्बीज समाधिसे भी उपराम हो जाता है अर्थात् योगी उस निर्बीज समाधिका भी सुख नहीं लेता, उसके सुखका भोक्ता नहीं बनता। उस समय वह अपने स्वरूपमें अपने-आपका अनुभव करता हुआ अपने-आपमें सन्तुष्ट होता है।
‘उपरमते’ पदका तात्पर्य है कि चित्तका संसारसे तो प्रयोजन रहा नहीं और स्वरूपको पकड़ सकता नहीं। कारण कि चित्त प्रकृतिका कार्य होनेसे जड है और स्वरूप चेतन है। जड चित्त स्वरूपको कैसे पकड़ सकता है? नहीं पकड़ सकता। इसलिये वह उपराम हो जाता है। चित्तके उपराम होनेपर योगीका चित्तसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।
‘तुष्यति’ कहनेका तात्पर्य है कि उसके सन्तोषका दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं रहता। केवल अपना स्वरूप ही उसके सन्तोषका कारण रहता है।इस श्लोकका सार यह है कि अपने द्वारा अपनेमें ही अपने स्वरूपकी अनुभूति होती है। वह तत्त्व अपने भीतर ज्यों-का-त्यों है। केवल संसारसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण चित्तकी वृत्तियाँ संसारमें लगती हैं, जिससे उस तत्त्वकी अनुभूति नहीं होती। जब ध्यानयोगके द्वारा चित्त संसारसे उपराम हो जाता है तब योगीका चित्तसे तथा संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होते ही उसको अपने-आपमें ही अपने स्वरूपकी अनुभूति हो जाती है।
विशेष बात
जिस तत्त्वकी प्राप्ति ध्यानयोगसे होती है, उसी तत्त्वकी प्राप्ति कर्मयोगसे होती है। परन्तु इन दोनों साधनोंमें थोड़ा अन्तर है। ध्यानयोगमें जब साधकका चित्त समाधिके सुखसे भी उपराम हो जाता है, तब वह अपने-आपसे अपने-आपमें सन्तुष्ट हो जाता है। कर्मयोगमें जब साधक मनोगत सम्पूर्ण कामनाओंका सर्वथा त्याग कर देता है, तब वह अपने-आपसे अपने-आपमें सन्तुष्ट होता है (गीता 2। 55)।ध्यानयोगमें अपने स्वरूपमें मन लगनेसे जब मन स्वरूपमें तदाकार हो जाता है, तब समाधि लगती है। उस समाधिसे भी जब मन उपराम हो जाता है, तब योगीका चित्तसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और वह अपने-आपमें सन्तुष्ट हो जाता है।कर्मयोगमें मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि पदार्थोंका और सम्पूर्ण क्रियाओँका प्रवाह केवल दूसरोंके हितकी तरफ हो जाता है, तब मनोगत सम्पूर्ण कामनाएँ छूट जाती हैं। कामनाओंका त्याग होते ही मनसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और वह अपने-आपमें सन्तुष्ट हो जाता है।
सम्बन्ध–पूर्वश्लोकमें कहा गया कि ध्यानयोगी अपने-आपसे अपने-आपमें ही सन्तोषका अनुभव करता है। अब उसके बाद क्या होता है–इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
।।6.21।। व्याख्या–‘सुखमात्यन्तिकं यत्’–ध्यानयोगी अपने द्वारा अपने-आपमें जिस सुखका अनुभव करता है, प्राकृत संसारमें उस सुखसे बढ़कर दूसरा कोई सुख हो ही नहीं सकता और होना सम्भव ही नहीं है। कारण कि यह सुख तीनों गुणोंसे अतीत और स्वतःसिद्ध है। यह सम्पूर्ण सुखोंकी आखिरी हद है–‘सा काष्ठा सा परा गतिः।’ इसी सुखको अक्षय सुख (5। 21), अत्यन्त सुख (6। 28) और ऐकान्तिक सुख (14। 27) कहा गया है।
इस सुखको यहाँ ‘आत्यन्तिक’ कहनेका तात्पर्य है कि यह सुख सात्त्विक सुखसे विलक्षण है। कारण कि सात्त्विक सुख तो परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे उत्पन्न होता है (गीता 18। 37); परन्तु यह आत्यन्तिक सुख उत्पन्न नहीं होता, प्रत्युत यह स्वतःसिद्ध अनुत्पन्न सुख है।
‘अतीन्द्रियम्’–इस सुखको इन्द्रियोंसे अतीत बतानेका तात्पर्य है कि यह सुख राजस सुखसे विलक्षण है। राजस सुख सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, परिस्थिति आदिके सम्बन्धसे पैदा होता है और इन्द्रियोंद्वारा भोगा जाता है। वस्तु, व्यक्ति आदिका प्राप्त होना हमारे हाथकी बात नहीं है और प्राप्त होनेपर उस सुखका भोग उस विषय (वस्तु, व्यक्ति आदि) के ही अधीन होता है। अतः राजस सुखमें पराधीनता है। परन्तु आत्यन्तिक सुखमें पराधीनता नहीं है। कारण कि आत्यन्तिक सुख इन्द्रियोंका विषय नहीं है। इन्द्रियोंकी तो बात ही क्या है, वहाँ मनकी भी पहुँच नहीं है। यह सुख तो स्वयंके द्वारा ही अनुभवमें आता है। अतः इस सुखको अतीन्द्रिय कहा है।‘बुद्धिग्राह्यम्’ इस सुखको बुद्धिग्राह्य बतानेका तात्पर्य है कि यह सुख तामस सुखसे विलक्षण है। तामस सुख निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होता है। गाढ़ निद्रा-(सुषुप्ति) में सुख तो मिलता है, पर उसमें बुद्धि लीन हो जाती है। आलस्य और प्रमादमें भी सुख होता है, पर उसमें बुद्धि ठीक-ठीक जाग्रत् नहीं रहती तथा विवेक-शक्ति भी लुप्त हो जाती है। परन्तु इस आत्यन्तिक सुखमें बुद्धि लीन नहीं होती और विवेकशक्ति भी ठीक जाग्रत् रहती है। पर इस आत्यन्तिक सुखको बुद्धि पकड़ नहीं सकती; क्योंकि प्रकृतिका कार्य बुद्धि प्रकृतिसे अतीत स्वरूपभूत सुखको पकड़ ही कैसे सकती है? यहाँ सुखको आत्यन्तिक, अतीन्द्रिय और बुद्धिग्राह्य बतानेका तात्पर्य है कि यह सुख सात्त्विक, राजस और तामस सुखसे विलक्षण अर्थात् गुणातीत स्वरूपभूत है।
‘वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः’–ध्यानयोगी अपने द्वारा ही अपने-आपके सुखका अनुभव करता है और इस सुखमें स्थित हुआ वह कभी किञ्चिन्मात्र भी विचलित नहीं होता अर्थात् इस सुखकी अखण्डता निरन्तर स्वतः बनी रहती है। जैसे, मुसलमानोंने धोखेसे शिवाजीके पुत्र संभाजीको कैद कर लिया और उनसे मुस्लिम-धर्म स्वीकार करनेके लिये कहा। परन्तु जब संभाजीने उसको स्वीकार नहीं किया, तब मुसलमानोंने उनकी आँखें निकाल लीं, उनकी चमड़ी खींच ली, तो भी वे अपने हिन्दूधर्मसे किञ्चिन्मात्र भी विचलित नहीं हुए। तात्पर्य यह निकला कि मनुष्य जबतक अपनी मान्यताको स्वयं नहीं छोड़ता, तबतक उसको दूसरा कोई छुड़ा नहीं सकता। जब अपनी मान्यताको भी कोई छुड़ा नहीं सकता, तो फिर जिसको वास्तविक सुख प्राप्त हो गया है, उस सुखको कोई कैसे छु़ड़ा सकता है और वह स्वयं भी उस सुखसे कैसे विचलित हो सकता है? नहीं हो सकता।मनुष्य उस वास्तविक सुखसे, ज्ञानसे, आनन्दसे कभी चलायमान नहीं होता–इससे सिद्ध होता है कि मनुष्य सात्त्विक सुखसे भी चलायमान होता है; उसका समाधिसे भी व्युत्थान होता है। परन्तु आत्यन्तिक सुखसे अर्थात् तत्त्वसे वह कभी विचलित और व्युत्थित नहीं होता; क्योंकि उसमें उसकी दूरी, भेद, भिन्नता मिट गयी और अब केवल वह-ही-वह रह गया। अब वह विचलित और व्युत्थित कैसे हो? विचलित और व्युत्थित तभी होता है, जब जडताका किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध रहता है। जबतक जडताका सम्बन्ध रहता है, तबतक वह एकरस नहीं रह सकता; क्योंकि प्रकृति सदा ही क्रियाशील रहती है।
सम्बन्ध–ध्यानयोगी तत्त्वसे चलायमान क्यों नहीं होता–इसका कारण आगेके श्लोकमें बताते हैं।
।।6.22।। व्याख्या–‘यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः’– मनुष्यको जो सुख प्राप्त है, उससे अधिक सुख दीखता है तो वह उसके लोभमें आकर विचलित हो जाता है। जैसे, किसीको एक घंटेके सौ रुपये मिलते हैं। अगर उतने ही समयमें दूसरी जगह हजार रुपये मिलते हों, तो वह सौ रुपयोंकी स्थितिसे विचलित हो जायगा और हजार रूपयोंकी स्थितिमें चला जायगा। निद्रा, आलस्य और प्रमादका तामस सुख प्राप्त होनेपर भी जब विषयजन्य सुख ज्यादा अच्छा लगता है, उसमें अधिक सुख मालूम देता है, तब मनुष्य तामस सुखको छोड़कर विषयजन्य सुखकी तरफ लपककर चला जाता है। ऐसे ही जब वह विषयजन्य सुखसे ऊँचा उठता है, तब वह सात्त्विक सुखके लिये विचलित हो जाता है और जब सात्त्विक सुखसे भी ऊँचा उठता है, तब वह आत्यन्तिक सुखके लिये विचलित हो जाता है। परन्तु जब आत्यन्तिक सुख प्राप्त हो जाता है, तो फिर वह उससे विचलित नहीं होता; क्योंकि आत्यन्तिक सुखसे बढ़कर दूसरा कोई सुख, कोई लाभ है ही नहीं। आत्यन्तिक सुखमें सुखकी हद हो जाती है। ध्यानयोगीको जब ऐसा सुख मिल जाता है, तो फिर वह इस सुखसे विचलित हो ही कैसे सकता है?
‘यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते’–विचलित होनेका दूसरा कारण है कि लाभ तो अधिक होता हो, पर साथमें महान् दुःख हो, तो मनुष्य उस लाभसे विचलित हो जाता है। जैसे, हजार रुपये मिलते हों, पर साथमें प्राणोंका भी खतरा हो, तो मनुष्य हजार रुपयोंसे विचलित हो जाता है। ऐसे ही मनुष्य जिस किसी स्थितिमें स्थित होता है, वहाँ कोई भयंकर आफत आ जाती है, तो मनुष्य उस स्थितिको छोड़ देता है। परन्तु यहाँ भगवान् कहते हैं कि आत्यन्तिक सुखमें स्थित होनेपर योगी बड़े-से-बड़े दुःखसे भी विचलित नहीं किया जा सकता। जैसे, किसी कारणसे उसके शरीरको फाँसी दे दी जाय, शरीरके टुकड़े-टुकड़े कर दिये जायँ, आपसमें भिड़ते दो पहाड़ोंके बीचमें शरीर दबकर पिस जाय, जीते-जी शरीरकी चमड़ी उतारी जाय, शरीरमें तरह-तरहके छेद किये जायँ, उबलते हुए तेलमें शरीरको डाला जाय– इस तरहके गुरुतर, महान् भयंकर दुःखोंके एक साथ आनेपर भी वह विचलित नहीं होता।
वह विचलित क्यों नहीं किया जा सकता? कारण कि जितने भी दुःख आते हैं, वे सभी प्रकृतिके राज्यमें अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिमें ही आते हैं, जब कि आत्यन्तिक सुख, स्वरूप-बोध प्रकृतिसे अतीत तत्त्व है। परन्तु जब पुरुष प्रकृतिस्थ हो जाता है अर्थात् शरीरके साथ तादात्म्य कर लेता है, तब वह प्रकृतिजन्य अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिमें अपनेको सुखी-दुःखी मानने लग जाता है (गीता 13। 21)। जब वह प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद करके अपने स्वरूपभूत सुखका अनुभव कर लेता है, उसमें स्थित हो जाता है, तो फिर यह प्राकृतिक दुःख वहाँतक पहुँच ही नहीं सकता, उसका स्पर्श ही नहीं कर सकता। इसलिये शरीरमें कितनी ही आफत आनेपर भी वह अपनी स्थितिसे विचलित नहीं किया जा सकता।
सम्बन्ध–जिस सुखकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक लाभकी सम्भावना नहीं रहती और जिसमें स्थित होनेपर बड़ा भारी दुःख भी विचलित नहीं करता, ऐसे सुखकी प्राप्तिके लिये आगेके श्लोकमें प्रेरणा करते हैं।
।।6.23।। व्याख्या–तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्–जिसके साथ हमारा सम्बन्ध है नहीं, हुआ नहीं, होगा नहीं और होना सम्भव ही नहीं, ऐसे दुःखरूप संसार-शरीरके साथ सम्बन्ध मान लिया, यही ‘दुःखसंयोग’ है। यह दुःखसंयोग ‘योग’ नहीं है। अगर यह योग होता अर्थात् संसारके साथ हमारा नित्य-सम्बन्ध होता, तो इस दुःखसंयोगका कभी वियोग (सम्बन्ध-विच्छेद) नहीं होता। परन्तु बोध होनेपर इसका वियोग हो जाता है। इससे सिद्ध होता है कि दुःखसंयोग केवल हमारा माना हुआ है, हमारा बनाया हुआ है, स्वाभाविक नहीं है। इससे कितनी ही दृढ़तासे संयोग मान लें और कितने ही लम्बे कालतक संयोग मान लें, तो भी इसका कभी संयोग नहीं हो सकता। अतः हम इस माने हुए आगन्तुक दुःखसंयोगका वियोग कर सकते हैं। इस दुःखसंयोग-(शरीर-संसार-) का वियोग करते ही स्वाभाविक योग की प्राप्ति हो जातीहै अर्थात् स्वरूपके साथ हमारा जो नित्ययोग है, उसकी हमें अनुभूति हो जाती है। स्वरूपके साथ नित्ययोगको ही यहाँ ‘योग’ समझना चाहिये।यहाँ दुःखरूप संसारके सर्वथा वियोगको ‘योग’ कहा गया है। इससे यह असर पड़ता है कि अपने स्वरूपके साथ पहले हमारा वियोग था, अब योग हो गया। परन्तु ऐसी बात नहीं है। स्वरूपके साथ हमारा नित्ययोग है। दुःखरूप संसारके संयोगका तो आरम्भ और अन्त होता है तथा संयोगकालमें भी संयोगका आरम्भ और अन्त होता रहता है। परन्तु इस नित्ययोगका कभी आरम्भ और अन्त नहीं होता। कारण कि यह योग मन, बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंसे नहीं होता, प्रत्युत इनके सम्बन्ध-विच्छेदसे होता है। यह नित्ययोग स्वतःसिद्ध है। इसमें सबकी स्वाभाविक स्थिति है। परन्तु अनित्य संसारसे सम्बन्ध मानते रहनेके कारण इस नित्ययोगकी विस्मृति हो गयी है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होते ही नित्ययोगकी स्मृति हो जाती है। इसीको अर्जुनने अठारहवें अध्यायके तिहत्तरवें श्लोकमें नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा कहा है। अतः यह योग नया नहीं हुआ है, प्रत्युत जो नित्ययोग है, उसीकी अनुभूति हुई है।
भगवान्ने यहाँ योगसंज्ञतिम् पद देकर दुःखके संयोगके वियोगका नाम ‘योग’ बताया है और दूसरे अध्यायमें समत्वं योग उच्यते कहकर समताको ही ‘योग’ बताया है। यहाँ साध्यरूप समताका वर्णन है और वहाँ (2। 48 में) साधनरूप समताका वर्णन है। ये दोनों बातें तत्त्वतः एक ही हैं; क्योंकि साधनरूप समता ही अन्तमें साध्यरूप समतामें परिणत हो जाती है।
पतञ्जलि महाराजने चित्तवृत्तियोंके निरोधको ‘योग’ कहा है–योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः (योगदर्शन 1। 2) और चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेपर द्रष्टाकी स्वरूपमें स्थिति बतायी है–तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् (1। 3)। परन्तु यहाँ भगवान्ने तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् पदोंसे द्रष्टाकी स्वरूपमें स्थितिको ही ‘योग ‘कहा है, जो स्वतःसिद्ध है।
यहाँ तम् कहनेका क्या तात्पर्य है? अठारहवें श्लोकमें योगीके लक्षण बताकर उन्नीसवें श्लोकमें दीपकके दृष्टान्तसे उसके अन्तःकरणकी स्थितिका वर्णन किया गया। उस ध्यानयोगीका चित्त जिस अवस्थामें उपराम हो जाता है, उसका संकेत बीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें यत्र पदसे किया और जब उस योगीकी स्थिति परमात्मामें हो जाती है, उसका संकेत श्लोकके उत्तरार्धमें यत्र पदसे किया। इक्कीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें यत् पदसे उस योगीके आत्यन्तिक सुखकी महिमा कही और उत्तरार्धमें यत्र पदसे उसकी अवस्थाका संकेत किया। बाईसवें श्लोकके पूर्वार्धमें यम् पदसे उस योगीके लाभका वर्णन किया और उत्तरार्धमें उसी लाभको यस्मिन् पदसे कहा। इस तरह बीसवें श्लोकसे बाईसवें श्लोकतक छः बार यत् (टिप्पणी प0 356) शब्दका प्रयोग करके योगीका जो विलक्षण स्थिति बतायी गयी है, उसीका यहाँ तम् पदे संकेत करके उसकी महिमा कही गयी है।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा–जिसमें दुःखोंके संयोगका ही अभाव है, ऐसे योग-(साध्यरूप समता-) का उद्देश्य रखकर साधकको न उकताये हुए चित्तसे निश्चयपूर्वक ध्यानयोगका अभ्यास करना चाहिये, जिसका इसी अध्यायके अठारहवेंसे बीसवें श्लोकतक वर्णन हुआ है।योगका अनुभव करनेके लिये सबसे पहले साधकको अपनी बुद्धि एक निश्चयवाली बनानी चाहिये अर्थात् ‘मेरेको तो योगकी ही प्राप्ति करनी है’ ऐसा एक निश्चय करना चाहिये। ऐसा निश्चय करनेपर संसारका कितना ही प्रलोभन आ जाय, कितनी ही भयंकर कष्ट आ जाय, तो भी उस निश्चयको नहीं छोड़ना चाहिये।
अनिर्विण्णचेतसा का तात्पर्य है कि समय बहुत लग गया, पुरुषार्थ बहुत किया, पर सिद्धि नहीं हुई !इसकी सिद्धि कब होगी? कैसे होगी?–इस तरह कभी उकताये नहीं। साधकका भाव ऐसा रहे कि चाहे कितनेही वर्ष लग जायँ, कितने ही जन्म लग जायँ, कितने ही भयंकरसेभयंकर दुःख आ जायँ, तो भी मेरेको तत्त्वको प्राप्त करना ही है। साधकके मनमें स्वतः-स्वाभाविक ऐसा विचार आना चाहिये कि मेरे अनेक जन्म हुए; पर वे सब-के-सब निरर्थक चले गये; उनसे कुछ भी लाभ नहीं हुआ। अनेक बार नरकोंके कष्ट भोगे, पर उनको भोगनेसे भी कुछ नहीं मिला अर्थात् केवल पूर्वके पाप नष्ट हुए, पर परमात्मा नहीं मिले। अब यदि इस जन्मका सारा-का-सारा समय, आयु और पुरुषार्थ परमात्माकी प्राप्तिमें लग जाय, तो कितनी बढ़िया बात है!
सम्बन्ध–पूर्वश्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने जिस योग-(साध्यरूप समता-) का वर्णन किया था, उसी योगकी प्राप्तिके लिये अब आगेके श्लोकसे निर्गुण-निराकारके ध्यानका प्रकरण आरम्भ करते हैं।