अव्यक्ताद्व्यक्तय: सर्वा: प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके॥
अव्यक्तात्, व्यक्तय:, सर्वा:, प्रभवन्ति, अहरागमे,
रात्र्यागमे, प्रलीयन्ते, तत्र, एव, अव्यक्तसञ्ज्ञके॥ १८॥
सर्वा: = सम्पूर्ण, व्यक्तय: = चराचर भूतगण, अहरागमे = ब्रह्माके दिनके प्रवेशकालमें, अव्यक्तात् = अव्यक्तसे अर्थात् ब्रह्माके सूक्ष्म शरीरसे, प्रभवन्ति = उत्पन्न होते हैं (और), रात्र्यागमे = ब्रह्माकी रात्रिके प्रवेशकालमें, तत्र = उस, अव्यक्तसंज्ञके = अव्यक्त नामक ब्रह्माके सूक्ष्म शरीरमें, एव = ही, प्रलीयन्ते = लीन हो जाते हैं।
‘जब (ब्रह्मा का) दिन प्रारंभ होता है, सभी अभिव्यक्तियाँ अव्यक्त स्थिति से उत्पन्न होती हैं; रात्रि आने पर, वे निश्चय ही केवल उसी में लुप्त हो जाती हैं, जिसे अव्यक्त कहा जाता है’।
।।8.18।। व्याख्या–‘अव्यक्ताद्व्यक्तयः ৷৷. तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके’–मात्र प्राणियोंके जितने शरीर हैं, उनको यहाँ ‘व्यक्तयः’और चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें ‘मूर्तयः’ कहा गया है। जैसे, जीवकृत सृष्टि अर्थात् ‘मैं’ और ‘मेरापन’ को लेकर जीवकी जो सृष्टि है, जीवके नींदसे जगनेपर वह सृष्टि जीवसे ही पैदा होती है और नींदके आ जानेपर वह सृष्टि जीवमें ही लीन हो जाती है। ऐसे ही जो यह स्थूल समष्टि सृष्टि दीखती है, वह सब-की-सब ब्रह्माजीके जगनेपर उनके सूक्ष्मशरीरसे अर्थात् प्रकृतिसे पैदा होती है और ब्रह्माजीके सोनेपर उनके सूक्ष्मशरीरमें ही लीन हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि ब्रह्माजीके जगनेपर तो ‘सर्ग’ होता है और ब्रह्माजीके सोनेपर ‘प्रलय’ होता है। जब ब्रह्माजीकी सौ वर्षकी आयु बीत जाती है, तब ‘महाप्रलय’ होता है, जिसमें ब्रह्माजी भी भगवान्में लीन हो जाते हैं। ब्रह्माजीकी जितनी आयु होती है, उतना ही महाप्रलयका समय रहता है। महाप्रलयका समय बीतनेपर ब्रह्माजी भगवान्से प्रकट हो जाते हैं तो ‘महासर्ग’ का आरम्भ होता है (गीता 9। 7 8)।