यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागा:।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये॥
यत्, अक्षरम्, वेदविद:, वदन्ति, विशन्ति, यत्, यतय:, वीतरागा:,
यत्, इच्छन्त:, ब्रह्मचर्यम्, चरन्ति, तत्, ते, पदम्, सङ्ग्रहेण, प्रवक्ष्ये॥ ११॥
वेदविद: = वेदके जाननेवाले विद्वान्, यत् = जिस सच्चिदानन्दघनरूप परमपदको, अक्षरम् = अविनाशी, वदन्ति = कहते हैं, वीतरागा: = आसक्तिरहित, यतय: = यत्नशील संन्यासी महात्माजन, यत् = जिसमें, विशन्ति = प्रवेश करते हैं(और), यत् = जिस परमपदको, इच्छन्त: = चाहनेवाले (ब्रह्मचारी लोग), ब्रह्मचर्यम् = ब्रह्मचर्यका, चरन्ति = आचरण करते हैं, तत् = उस, पदम् = परमपदको (मैं), ते = तेरे लिये, सङ्ग्रहेण = संक्षेपसे, प्रवक्ष्ये = कहूँगा।
‘वेदों के ज्ञाता जिसे अक्षर कहते हैं, जिसमें आत्मनियंत्रित (संन्यासी) आसक्ति से मुक्त हो कर प्रविष्ट होते हैं, और जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये वे एक ब्रह्मचारीका जीवन व्यतीत करते हैं, वह मैं तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ’।
।।8.11।। व्याख्या–[सातवें अध्यायके उनतीसवें श्लोकमें जो निर्गुण-निराकार परमात्माका वर्णन हुआ था, उसीको यहाँ ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें श्लोकमें विस्तारसे कहा गया है।]
‘यदक्षरं वेदविदो वदन्ति’–वेदोंको जाननेवाले पुरुष जिसको अक्षर-निर्गुण-निराकार कहते हैं, जिसका कभी नाश नहीं होता, जो सदा-सर्वदा एकरूप, एकरस रहता है और जिसको इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें ‘अक्षरं ब्रह्म परमम्’ कहा गया है, उसी निर्गुण-निराकार तत्त्वका यहाँ ‘अक्षर’ नामसे वर्णन हुआ है।
‘विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः’–जिनके अन्तःकरणमें रागका अत्यन्त अभाव हो गया है; अतः जिनका अन्तःकरण महान् निर्मल है और जिनके हृदयमें सर्वोपरि अद्वितीय परम तत्त्वको पानेकी उत्कट लगन लगी है, ऐसे प्रयत्नशील यति महापुरुष उस तत्त्वमें प्रवेश करते हैं–उसको प्राप्त करते हैं।
‘यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति’–जिनका उद्देश्य केवल परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका है, परमात्मप्राप्तिके सिवाय जिनका और कोई ध्येय है ही नहीं और जो परमात्मप्राप्तिकी इच्छा रखकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, सम्पूर्ण इन्द्रियोंका संयम करते हैं अर्थात् किसी भी विषयका भोगबुद्धिसे सेवन नहीं करते।
‘तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये’–जो सम्पूर्ण साधनोंका आखिरी फल है, उस पदको अर्थात् तत्त्वको मैं तेरे लिये संक्षेपसे और अच्छी तरहसे कहूँगा। संक्षेपसे कहनेका तात्पर्य है कि शास्त्रोंमें जिस तत्त्वको सर्वोपरि विलक्षण बताया गया है, हरेक आदमी उसको प्राप्त नहीं कर सकता–ऐसी जिसकी महिमा बतायी गयी है; वह पद (तत्त्व) किस तरहसे प्राप्त होता है– इस बातको मैं कहूँगा। अच्छी तरहसे कहनेका तात्पर्य है कि ब्रह्मकी उपासना करनेवाले जिस तरहसे उस ब्रह्मको प्राप्त हो जाते हैं, उसको मैं अच्छी तरहसे कहूँगा।
सम्बन्ध —अन्तकालमें उस निर्गुण-निराकार तत्त्वकी प्राप्तिकी फलसहित विधि बतानेके लिये आगेके दो श्लोक कहते हैं।