अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥
अधियज्ञ: कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभि:॥
किम्, तत्, ब्रह्म, किम्, अध्यात्मम्, किम्, कर्म, पुरुषोत्तम,
अधिभूतम्, च, किम्, प्रोक्तम्, अधिदैवम्, किम्, उच्यते॥ १॥
अधियज्ञ:, कथम्, क:, अत्र, देहे, अस्मिन्, मधुसूदन,
प्रयाणकाले, च, कथम्, ज्ञेय:, असि, नियतात्मभि:॥ २॥
पुरुषोत्तम = हे पुरुषोत्तम!, तत् = वह, ब्रह्म = ब्रह्म, किम् = क्या है, अध्यात्मम् = अध्यात्म, किम् = क्या है, कर्म = कर्म, किम् = क्या है, अधिभूतम् = अधिभूत (नामसे), किम् = क्या, प्रोक्तम् = कहा गया है, च = और, अधिदैवम् = अधिदैव, किम् = किसको, उच्यते = कहते हैं।
मधुसूदन = हे मधुसूदन!, अत्र = यहाँ, अधियज्ञ: = अधियज्ञ, क: = कौन है(और वह), अस्मिन् = इस, देहे = शरीरमें, कथम् = कैसे है, च = तथा, नियतात्मभि: = युक्त चित्तवाले पुरुषोंद्वारा, प्रयाणकाले = अन्त समयमें (आप), कथम् = किस प्रकार, ज्ञेय: = जाननेमें आते, असि = हैं।
‘अर्जुन ने कहा’ : ‘ हे पुरुष श्रेष्ठ वह ब्रह्म क्या है, अध्यात्म क्या है, कर्मक्या है? अधिभूत किसे कहते हैं और अधिदैव क्या है?’ ‘हे मधु का वध करने वाले श्रीकृष्ण, कौन और किस रूप में इस शरीर में अधियज्ञ है? और मृत्यु के समय आत्मनियंत्रित व्यक्तियों के द्वारा आप कैसे जाने जाते हैं?’
।।8.1।। व्याख्या–‘पुरुषोत्तम किं तद्ब्रह्म’– हे पुरुषोत्तम वह ब्रह्म क्या है अर्थात् ब्रह्म शब्दसे क्या समझना चाहिये’
‘किमध्यात्मम्’– अध्यात्म शब्दसे आपका क्या अभिप्राय है
‘किं कर्म’ — कर्म क्या है अर्थात् कर्म शब्दसे आपका क्या भाव है
‘अधिभूतं च किं प्रोक्तम्’ — आपने जो अधिभूत शब्द कहा है उसका क्या तात्पर्य है
‘अधिदैवं किमुच्यते’ — अधिदैव किसको कहा जाता है
‘अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्’ — इस प्रकरणमें अधियज्ञ शब्दसे किसको लेना चाहिये। वह,अधियज्ञ इस देहमें कैसे है
‘मधुसूदन प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः’ — हे मधुसूदन जो पुरुष वशीभूत अन्तःकरणवाले हैं अर्थात् जो संसारसे सर्वथा हटकर अनन्यभावसे केवल आपमें ही लगे हुए हैं उनके द्वारा अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं अर्थात् वे आपके किस रूपको जानते हैं और किस प्रकारसे जानते हैं
सम्बन्ध — अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुनके छः प्रश्नोंका क्रमसे उत्तर देते हैं।
।।8.2।। व्याख्या–‘पुरुषोत्तम किं तद्ब्रह्म’–हे पुरुषोत्तम वह ब्रह्म क्या है अर्थात् ब्रह्म शब्दसे क्या समझना चाहिये
‘किमध्यात्मम्’–अध्यात्म शब्दसे आपका क्या अभिप्राय है
‘किं कर्म’–कर्म क्या है अर्थात् कर्म शब्दसे आपका क्या भाव है
‘अधिभूतं च किं प्रोक्तम्’–आपने जो अधिभूत शब्द कहा है उसका क्या तात्पर्य है
‘अधिदैवं किमुच्यते’–अधिदैव किसको कहा जाता है
‘अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्’ — इस प्रकरणमें अधियज्ञ शब्दसे किसको लेना चाहिये। वह,अधियज्ञ इस देहमें कैसे है
‘मधुसूदन प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः’–हे मधुसूदन जो पुरुष वशीभूत अन्तःकरणवाले हैं अर्थात् जो संसारसे सर्वथा हटकर अनन्यभावसे केवल आपमें ही लगे हुए हैं उनके द्वारा अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं अर्थात् वे आपके किस रूपको जानते हैं और किस प्रकारसे जानते हैं
सम्बन्ध —अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुनके छः प्रश्नोंका क्रमसे उत्तर देते हैं।