यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥60॥
यतत:, हि, अपि, कौन्तेय, पुरुषस्य, विपश्चित:,
इन्द्रियाणि, प्रमाथीनि, हरन्ति, प्रसभम्, मन:॥ ६०॥
कौन्तेय = हे अर्जुन!, हि = आसक्तिका नाश न होनेके कारण, प्रमाथीनि = ये प्रमथन स्वभाववाली, इन्द्रियाणि = इन्द्रियाँ, यतत: = यत्न करते हुए, विपश्चित: = बुद्धिमान्, पुरुषस्य = पुरुषके, मन: = मनको, अपि = भी, प्रसभम् = बलात्, हरन्ति = हर लेती हैं।
‘हे कुन्तिपुत्र, अशान्त, उपद्रवी इन्द्रियाँ पूर्णता के लिए प्रयत्नशील एक बुद्धिमान व्यक्ति का भी मन बलपूर्वक हर लेती हैं।
व्याख्या—‘यततो ह्यपि …. प्रसभं मन:’१—जो स्वयं यत्न करता है, साधन करता है, हरेक कामको विवेकपूर्वक करता है, आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करता है, दूसरोंका हित हो, दूसरोंको सुख पहुँचे, दूसरोंका कल्याण हो—ऐसा भाव रखता है और वैसी क्रिया भी करता है, जो स्वयं कर्तव्य-अकर्तव्य, सार-असारको जानता है और कौन-कौन-से कर्म करनेसे उनका क्या-क्या परिणाम होता है—इसको भी जाननेवाला है, ऐसे विद्वान् पुरुषके लिये यहाँ ‘यततो ह्यपि पुरुषस्य विपश्चित:’ पद आये हैं।
(१-यहाँ भगवान् ने इन्द्रियोंको ‘प्रमाथीनि’ कहा है और छठे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें अर्जुनने मनको ‘प्रमाथि’ कहा है। अत: इन्द्रियाँ और मन दोनों ही प्रमथनशील हैं। ऐसे ही यहाँ बताया कि इन्द्रियाँ मनको हर लेती हैं और आगे इसी अध्यायके सड़सठवें श्लोकमें बताया है कि मन बुद्धिको हर लेता है अर्थात् यहाँ तो इन्द्रियोंकी प्रबलता बतायी और वहाँ मनकी प्रबलता बतायी। तात्पर्य यह निकला कि साधकको इन दोनोंका संयमन करना चाहिये, तभी वह संयमी बन सकता है।)
प्रयत्न करनेवाले ऐसे विद्वान् पुरुषकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं, विषयोंकी तरफ खींच लेती हैं अर्थात् वह विषयोंकी तरफ खिंच जाता है, आकृष्ट हो जाता है। इसका कारण यह है कि जबतक बुद्धि सर्वथा परमात्मतत्त्वमें प्रतिष्ठित (स्थित) नहीं होती, बुद्धिमें संसारकी यत्किंचित् सत्ता रहती है, विषयेन्द्रिय-सम्बन्धसे सुख होता है, भोगे हुए भोगोंके संस्कार रहते हैं, तबतक साधनपरायण बुद्धिमान् विवेकी पुरुषकी भी इन्द्रियाँ सर्वथा वशमें नहीं होतीं। इन्द्रियोंके विषय सामने आनेपर भोगे हुए भोगोंके संस्कारोंके कारण इन्द्रियाँ मन-बुद्धिको जबर्दस्ती विषयोंकी तरफ खींच ले जाती हैं। ऐसे अनेक ऋषियोंके उदाहरण भी आते हैं, जो विषयोंके सामने आनेपर विचलित हो गये। अत: साधकको अपनी इन्द्रियोंपर कभी भी ‘मेरी इन्द्रियाँ वशमें हैं’, ऐसा विश्वास नहीं करना चाहिये* और कभी भी यह अभिमान नहीं करना चाहिये कि ‘मैं जितेन्द्रिय हो गया हूँ।’
(* मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत्।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥ (मनु० २। २१५)
‘मनुष्यको चाहिये कि वह माता, बहन अथवा पुत्रीके साथ भी एकान्तमें न बैठे; क्योंकि बलवान् इन्द्रियसमूह विद्वान् को भी अपने वशमें कर लेता है।’)
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बताया कि रसबुद्धि रहनेसे यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी इन्द्रियाँ उसके मनको हर लेती हैं, जिससे उसकी बुद्धि परमात्मामें प्रतिष्ठित नहीं होती। अत: रसबुद्धिको दूर कैसे किया जाय—इसका उपाय आगेके श्लोकमें बताते हैं।