अङ्गुष्ठमात्र: पुरुषोऽन्तरात्मा
सदा जनानां हृदये सन्निविष्ट:।
तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण
तं विद्याच्छुक्रममृतं विद्याच्छुक्रममृतमिति॥ १७॥ *
* इसका पूर्वार्ध श्वेता० ३। १३ के पूर्वार्धसे मिलता है।
अन्तरात्मा=सबका अन्तर्यामी; अङ्गुष्ठमात्र:=अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; पुरुष:=परमपुरुष; सदा=सदैव; जनानाम्=मनुष्योंके; हृदये=हृदयमें; सन्निविष्ट:=भलीभाँति प्रविष्ट है; तम्=उसको; मुञ्जात् =मूँजसे; इषीकाम् इव=सींककी भाँति; स्वात् =अपनेसे (और); शरीरात् =शरीरसे; धैर्येण=धीरतापूर्वक; प्रवृहेत् =पृथक् करके देखे; तम्=उसीको; शुक्रम् अमृतम् विद्यात् =विशुद्ध अमृतस्वरूप समझे; तम् शुक्रम् अमृतम् विद्यात् =(और)उसीको विशुद्ध अमृतस्वरूप समझे॥ १७॥
व्याख्या—सबके अन्तर्यामी परमपुरुष परमेश्वर हृदयके अनुरूप अङ्गुष्ठमात्र रूपवाले होकर सदैव सभी मनुष्योंके भीतर निवास करते हैं, तो भी मनुष्य उनकी ओर देखतातक नहीं। जो प्रमादरहित होकर उनकी प्राप्तिके साधनमें लगे हैं, उन मनुष्योंको चाहिये कि उन शरीरस्थ परमेश्वरको इस शरीरसे और अपने-आपसे भी उसी तरह पृथक् और विलक्षण समझें, जैसे साधारण लोग मूँजसे सींकको पृथक् देखते हैं। अर्थात् जिस प्रकार मूँजमें रहनेवाली सींक मूँजसे विलक्षण और पृथक् है, उसी प्रकार वह शरीर और आत्माके भीतर रहनेवाला परमेश्वर उन दोनोंसे सर्वथा विलक्षण है। वही विशुद्ध अमृत है, वही विशुद्ध अमृत है। यहाँ यह वाक्यकी पुनरावृत्ति उपदेशकी समाप्ति एवं सिद्धान्तकी निश्चितताको सूचित करती है॥ १७॥