यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिता:।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते॥ १४॥
अस्य=इस (साधक) के; हृदि श्रिता:=हृदयमें स्थित; ये कामा:=जो कामनाएँ (हैं); सर्वे यदा=(वे) सब-की-सब जब; प्रमुच्यन्ते=समूल नष्ट हो जाती हैं; अथ=तब; मर्त्य:=मरणधर्मा मनुष्य; अमृत:=अमर; भवति=हो जाता है (और); अत्र=(वह) यहीं; ब्रह्म समश्नुते=ब्रह्मका भलीभाँति अनुभव कर लेता है॥ १४॥
व्याख्या—मनुष्यका हृदय नित्य-निरन्तर विभिन्न प्रकारकी ऐहलौकिक और पारलौकिक कामनाओंसे भरा रहता है; इसी कारण न तो वह कभी यह विचार ही करता है कि परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है और न काम्यविषयोंकी आसक्तिके कारण वह परमात्माको पानेकी अभिलाषा ही करता है। ये सारी कामनाएँ साधक पुरुषके हृदयसे जब समूल नष्ट हो जाती हैं; तब वह—जो सदासे मरणधर्मा था—अमर हो जाता है और यहीं—इस मनुष्य-शरीरमें ही उस परब्रह्म परमेश्वरका भलीभाँति साक्षात् अनुभव कर लेता है॥ १४॥
सम्बन्ध—संशयरहित दृढ़ निश्चयकी महिमा बतलाते हैं—