तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ॥ ११॥
ताम्=उस; स्थिराम् इन्द्रियधारणाम्=इन्द्रियोंकी स्थिर धारणाको ही; योगम् इति=‘योग’; मन्यन्ते=मानते हैं; हि=क्योंकि; तदा=उस समय; अप्रमत्त:=(साधक) प्रमादरहित; भवति=हो जाता है; योग:=योग; प्रभवाप्ययौ=उदय और अस्त होनेवाला है॥ ११॥
व्याख्या—इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी स्थिर धारणाका ही नाम योग है—ऐसा अनुभवी योगी महानुभाव मानते हैं; क्योंकि उस समय साधक विषय-दर्शनरूप सब प्रकारके प्रमादसे सर्वथा रहित हो जाता है। परंतु यह योग उदय और अस्त होनेवाला है; अत: परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छावाले साधकको निरन्तर योगयुक्त रहनेका दृढ़ अभ्यास करते रहना चाहिये॥ ११॥