इन्द्रियेभ्य: परं मनो मनस: सत्त्वमुत्तमम्।
सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम्॥ ७॥
इन्द्रियेभ्य:=इन्द्रियोंसे (तो); मन:=मन; परम्=श्रेष्ठ है; मनस:=मनसे; सत्त्वम्=बुद्धि; उत्तमम्=उत्तम है; सत्त्वात् =बुद्धिसे; महान् आत्मा=उसका स्वामी जीवात्मा; अधि=ऊँचा है (और); महत:=जीवात्मासे; अव्यक्तम्=अव्यक्त शक्ति; उत्तमम्=उत्तम है॥ ७॥
व्याख्या—इन्द्रियोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि उत्तम है, बुद्धिसे इनका स्वामी जीवात्मा ऊँचा है; क्योंकि उन सबपर इसका अधिकार है। वे सभी इसकी आज्ञाका पालन करनेवाले हैं और यह उनका शासक है, अत: उनसे सर्वथा विलक्षण है। इस जीवात्मासे भी इसका अव्यक्त (कारण) शरीर प्रबल है, जो कि भगवान्की उस प्रकृतिका अंश है, जिसने इसको बन्धनमें डाल रखा है। तुलसीदासजीने भी कहा है ‘जेहि बस कीन्हें जीव निकाया’। गीतामें भी प्रकृतिजनित तीनों गुणोंके द्वारा जीवात्माके बाँधे जानेकी बात कही गयी है (१४। ५)॥ ७॥