इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत्।
पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति॥ ६॥
पृथक्=(अपने-अपने कारणसे) भिन्न-भिन्न रूपोंमें; उत्पद्यमानानाम्=उत्पन्न हुई; इन्द्रियाणाम्=इन्द्रियोंकी; यत् =जो; पृथक् भावम्=पृथक्-पृथक् सत्ता है; च=और; [यत्]=जो उनका; उदयास्तमयौ=उदय और लय हो जानारूप स्वभाव है; [तत्]=उसे; मत्वा=जानकर; धीर:=(आत्माका स्वरूप उनसे विलक्षण समझनेवाला) धीर पुरुष; न शोचति=शोक नहीं करता॥ ६॥
व्याख्या—शब्द-स्पर्शादि विषयोंके अनुभवरूप पृथक्-पृथक् कार्य करनेके लिये भिन्न-भिन्न रूपमें उत्पन्न हुई इन्द्रियोंके जो पृथक्-पृथक् भाव हैं तथा जाग्रत्-अवस्थामें कार्यशील हो जाना और सुषुप्तिकालमें लय हो जानारूप जो उनकी परिवर्तनशीलता है, इनपर विचार करके जब बुद्धिमान् मनुष्य इस रहस्यको समझ लेता है कि ‘ये इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि या इनका संघातरूप यह शरीर मैं नहीं हूँ, मैं इनसे सर्वथा विलक्षण नित्य चेतन हूँ, सर्वथा विशुद्ध एवं सदा एकरस हूँ,’ तब वह किसी प्रकारका शोक नहीं करता, सदाके लिये दु:ख और शोकसे रहित हो जाता है॥ ६॥
सम्बन्ध—अगले दो मन्त्रोंमें तत्त्वविचार करते हैं—