अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥ ९॥
यथा=जिस प्रकार; भुवनम्=समस्त ब्रह्माण्डमें; प्रविष्ट:=प्रविष्ट; एक: अग्नि:=एक ही अग्नि; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमें; प्रतिरूप:=उनके समान रूपवाला-सा; बभूव=हो रहा है; तथा=वैसे (ही); सर्वभूतान्तरात्मा=समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा परब्रह्म; एक: [सन् अपि]=एक होते हुए भी; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमें; प्रतिरूप:=उन्हींके जैसे रूपवाला (हो रहा है); च बहि:=और उनके बाहर भी है॥ ९॥
व्याख्या—एक ही अग्नि निराकाररूपसे सारे ब्रह्माण्डमें व्याप्त है, उसमें कोई भेद नहीं है, परंतु जब वह साकाररूपसे प्रज्वलित होता है, तब उन आधारभूत वस्तुओंका जैसा आकार होता है, वैसा ही आकार अग्निका भी दृष्टिगोचर होता है। इसी प्रकार समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी परमेश्वर एक हैं और सबमें समभावसे व्याप्त हैं, उनमें किसी प्रकारका कोई भेद नहीं है, तथापि वे भिन्न-भिन्न प्राणियोंमें उन-उन प्राणियोंके अनुरूप नाना रूपोंमें प्रकाशित होते हैं। भाव यह कि आधारभूत वस्तुके अनुरूप ही उनकी महिमाका प्राकटॺ होता है। वास्तवमें उन परमेश्वरकी महत्ता इतनी ही नहीं है, इससे बहुत अधिक विलक्षण है। उनकी अनन्त शक्तिके एक क्षुद्रतम अंशसे ही यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नाना प्रकारकी आश्चर्यमय शक्तियोंसे सम्पन्न हो रहा है॥ ९॥
सम्बन्ध—वही बात वायुके दृष्टान्तसे कहते हैं—