हॸस: शुचिषद् वसुरन्तरिक्षस-
द्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ।
नृषद् वरसदृतसद् व्योमसदब्जा
गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत्*॥ २॥
* यह मन्त्र यजुर्वेद १०। २४,१२। १४ और ऋग्वेद ४। ४०। ५ में है।
शुचिषत् =जो विशुद्ध परमधाममें रहनेवाला; हंस:=स्वयं प्रकाश (पुरुषोत्तम) है (वही); अन्तरिक्षसत् =अन्तरिक्षमें निवास करनेवाला; वसु:=वसु है; दुरोणसत् =घरोंमें उपस्थित होनेवाला; अतिथि:=अतिथि है (और); वेदिषत् होता=यज्ञकी वेदीपर स्थापित अग्निस्वरूप तथा उसमें आहुति डालनेवाला ‘होता’ है (तथा); नृषत् =समस्त मनुष्योंमें रहनेवाला; वरसत् =मनुष्योंसे श्रेष्ठ देवताओंमें रहनेवाला; ऋतसत् =सत्यमें रहनेवाला (और); व्योमसत् =आकाशमें रहनेवाला (है तथा); अब्जा:=जलोंमें नाना रूपोंसे प्रकट होनेवाला; गोजा:=पृथिवीमें नाना रूपोंसे प्रकट होनेवाला; ऋतजा:=सत्कर्मोंमें प्रकट होनेवाला (और); अद्रिजा:=पर्वतोंमें नाना रूपसे प्रकट होनेवाला (है); बृहत् ऋतम्=(वही) सबसे बड़ा परम सत्य है॥ २॥
व्याख्या—जो प्राकृतिक गुणोंसे सर्वथा अतीत दिव्य विशुद्ध परमधाममें विराजित स्वयं प्रकाश परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं, वे ही अन्तरिक्षमें विचरनेवाले वसु नामक देवता हैं, वे ही अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरोंमें उपस्थित होते हैं; वे ही यज्ञकी वेदीपर प्रतिष्ठित ज्योतिर्मय अग्नि तथा उसमें आहुति प्रदान करनेवाले ‘होता’ हैं, वे ही समस्त मनुष्योंके रूपमें स्थित हैं; मनुष्योंकी अपेक्षा श्रेष्ठ देवता और पितृ आदि रूपमें स्थित, आकाशमें स्थित और सत्यमें प्रतिष्ठित हैं; वे ही जलोंमें मत्स्य, शङ्ख, शुक्ति आदिके रूपमें प्रकट होते हैं; पृथिवीमें वृक्ष, अङ्कुर, अन्न, ओषधि आदिके रूपमें, यज्ञादि सत्कर्मोंमें नाना प्रकारके यज्ञफलादिके रूपमें और पर्वतोंमें नद-नदी आदिके रूपमें प्रकट होते हैं। वे सभी दृष्टियोंसे सभीकी अपेक्षा श्रेष्ठ, महान् और परम सत्य तत्त्व हैं॥ २॥