मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन।
मृत्यो: स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति॥ ११॥
मनसा एव=(शुद्ध) मनसे ही; इदम् आप्तव्यम्=यह परमात्मतत्त्व प्राप्त किये जानेयोग्य है; इह=इस जगत्में (एक परमात्माके अतिरिक्त); नाना=नाना (भिन्न-भिन्न भाव); किंचन=कुछ भी; न अस्ति=नहीं है; (इसलिये) य: इह=जो इस जगत् में; नाना इव=नानाकी भाँति; पश्यति=देखता है; स:=वह मनुष्य; मृत्यो:=मृत्युसे; मृत्युम् गच्छति=मृत्युको प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है॥ ११॥
व्याख्या—परमात्माका परमतत्त्व शुद्ध मनसे ही इस प्रकार जाना जा सकता है कि इस जगत्में एकमात्र पूर्णब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण हैं। सब कुछ उन्हींका स्वरूप है। यहाँ परमात्मासे भिन्न कुछ भी नहीं है। जो यहाँ विभिन्नताकी झलक देखता है, वह मनुष्य मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है॥ ११॥