यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति।
तं देवा: सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन॥
एतद्वै तत् ॥ ९॥ *
* अथर्ववेद १०। ८। १९।
यत:=जहाँसे; सूर्य:=सूर्यदेव; उदेति=उदय होते हैं; च=और; यत्र=जहाँ; अस्तम् च=अस्तभावको भी; गच्छति=प्राप्त होते हैं; सर्वे=सभी; देवा:=देवता; तम्=उसीमें; अर्पिता:=समर्पित हैं; तत् उ=उस परमेश्वरको; कश्चन=कोई (कभी भी); न अत्येति=नहीं लाँघ सकता; एतत् वै=यही है; तत् =वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था)॥ ९॥
व्याख्या—जिन परमेश्वरसे सूर्यदेव प्रकट होते हैं और जिनमें जाकर विलीन हो जाते हैं, जिनकी महिमामें ही यह सूर्यदेवताकी उदय-अस्तलीला नियमपूर्वक चलती है; उन परब्रह्ममें ही सम्पूर्ण देवता प्रविष्ट हैं—सब उन्हींमें ठहरे हुए हैं। ऐसा कोई भी नहीं है जो उन सर्वात्मक, सर्वमय, सबके आदि, अन्त, आश्रयस्थल परमेश्वरकी महिमा और व्यवस्थाका उल्लङ्घन कर सके। सर्वतोभावसे सभी सर्वदा उनके अधीन और उन्हींके अनुशासनमें रहते हैं। कोई भी उनकी महिमाका पार नहीं पा सकता। वे सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तम ही तुम्हारे पूछे हुए ब्रह्म हैं॥ ९॥