य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात्।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते॥
एतद्वै तत् ॥ ५॥
य:=जो मनुष्य; मध्वदम्=कर्मफलदाता; जीवम्*=सबको जीवन प्रदान करनेवाले; (तथा) भूतभव्यस्य=भूत, (वर्तमान) और भविष्यका; ईशानम्=शासन करनेवाले; इमम्=इस; आत्मानम्=परमात्माको; अन्तिकात् वेद=(अपने) समीप जानता है; तत: [स:]=उसके बाद वह; न विजुगुप्सते=(कभी) किसीकी निन्दा नहीं करता; एतत् वै=यह ही (है); तत् =वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था)॥ ५॥
* यहाँ ‘जीव’ शब्द परमात्माके लिये ही प्रयुक्त हुआ है; क्योंकि भूत, भविष्य और वर्तमानका शासक जीव नहीं हो सकता। प्रकरण भी यहाँ परमात्माका है, जीवका नहीं (देखिये ब्रह्मसूत्र १। ३। २४ का शाङ्करभाष्य)।
व्याख्या—जो साधक सबको जीवन प्रदान करनेवाले, जीवोंके परम जीवन और उन्हें उनके कर्मोंका फल भुगतानेवाले तथा भूत, वर्तमान और भावी जगत्का एकमात्र शासन करनेवाले उस परब्रह्म परमेश्वरको इस प्रकार समझ लेता है कि ‘वह अन्तर्यामीरूपसे निरन्तर मेरे समीप मेरे हृदयमें ही स्थित है और इससे स्वाभाविक ही यह अनुमान कर लेता है कि इसी प्रकार वे सर्वनियन्ता परमात्मा सबके हृदयमें स्थित हैं, वह फिर उनके इस महिमामय स्वरूपको कभी नहीं भूल सकता। इसलिये वह कभी किसीकी निन्दा नहीं करता, किसीसे भी घृणा या द्वेष नहीं करता। नचिकेता! तुमने जिस ब्रह्मके विषयमें पूछा था, वह यही है, जिसका मैंने ऊपर वर्णन किया है॥ ५॥
सम्बन्ध—अब यह बतलाते हैं कि ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त प्राणी उन परब्रह्म परमेश्वरसे ही उत्पन्न हुए हैं; अत: जो कुछ भी है, सब उन्हींका रूपविशेष है। उनसे भिन्न यहाँ कुछ भी नहीं है; क्योंकि इस सम्पूर्ण जगत्के अभिन्ननिमित्तोपादान कारण एकमात्र परमेश्वर ही हैं, वे एक ही अनेक रूपोंमें स्थित हैं।