येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाॸश्च मैथुनान्।
एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते॥
एतद्वै तत्॥ ३॥
येन=जिसके अनुग्रहसे (मनुष्य); शब्दान्=शब्दोंको; स्पर्शान्=स्पर्शोंको; रूपम्=रूप-समुदायको; रसम्=रस-समुदायको; गन्धम्=गन्धसमुदायको; च=और; मैथुनान्=स्त्री-प्रसंग आदिके सुखोंको; विजानाति=अनुभव करता है; एतेन एव=इसीके अनुग्रहसे (यह भी जानता है कि); अत्र किम्=यहाँ क्या; परिशिष्यते=शेष रह जाता है; एतत् वै=यह ही है; तत्=वह परमात्मा (जिसके विषयमें तुमने पूछा था)॥ ३॥
व्याख्या—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धात्मक सब प्रकारके विषयोंका और स्त्री-सहवासादिसे होनेवाले सुखोंका मनुष्य जिस परम देवसे मिली हुई ज्ञानशक्तिके द्वारा अनुभव करता है, उन्हींकी दी हुई शक्तिसे इनकी क्षणभङ्गुरताको देखकर वह यह भी समझ सकता है कि इन सबमेंसे ऐसी कौन वस्तु है, जो यहाँ शेष रहेगी? विचार करनेपर यही समझमें आता है कि ये सभी पदार्थ प्रतिक्षण बदलनेवाले होनेसे विनाशशील हैं। इन सबके परम कारण एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही नित्य हैं। वे पहले भी थे और पीछे भी रहेंगे। अत: हे नचिकेता! तुम्हारा पूछा हुआ वह ब्रह्मतत्त्व यही है, जो सबका शेषी है, सबका पर्यवसान है, सबकी अवधि और सबकी परम गति है॥ ३॥