पराच: कामाननुयन्ति बाला-
स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम्।
अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा
ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते॥ २॥
[ये] बाला:=जो मूर्ख; पराच: कामान्=बाह्य भोगोंका; अनुयन्ति=अनुसरण करते हैं (उन्हींमें रचे-पचे रहते हैं); ते=वे; विततस्य=सर्वत्र फैले हुए; मृत्यो:=मृत्युके; पाशम्=बन्धनमें; यन्ति=पड़ते हैं; अथ=किंतु; धीरा:=बुद्धिमान् मनुष्य; ध्रुवम्=नित्य; अमृतत्वम्=अमरपदको; विदित्वा=विवेकद्वारा जानकर; इह=इस जगत् में; अध्रुवेषु=अनित्य भोगोंमेंसे किसीको (भी); न प्रार्थयन्ते=नहीं चाहते॥ २॥
व्याख्या—जो बाह्य विषयोंकी चमक-दमक और आपातरमणीयताको देखकर उनमें आसक्त हुए रहते हैं और उनके पाने तथा भोगनेमें ही दुर्लभ एवं अमूल्य मनुष्य-जीवनको खो देते हैं, वे मूर्ख हैं। निश्चय ही वे सर्वकालव्यापी मृत्युके पाशमें बँध जाते हैं, दीर्घकालतक नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म धारण करके बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं, परंतु जो बुद्धिमान् हैं, वे इस विषयपर गहराईसे यों विचार करते हैं कि ये इन्द्रियोंके भोग तो जीवको दूसरी योनियोंमें भी पर्याप्त मिल सकते हैं। मनुष्य-शरीर उन सबसे विलक्षण है। इसका वास्तविक उद्देश्य विषयोपभोग कभी नहीं हो सकता। इस प्रकार विचार करनेपर जब यह बात उनकी समझमें आ जाती है कि इसका उद्देश्य अमृतस्वरूप नित्य परब्रह्म परमात्माको प्राप्त करना है और वह इसी शरीरमें प्राप्त किया जा सकता है, तब वे सर्वतोभावसे उसीकी ओर लग जाते हैं। फिर वे इस विनाशशील जगत्में क्षणभङ्गुर भोगोंको प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं करते, इनसे सर्वथा विरक्त होकर सावधानीके साथ परमार्थ-साधनमें लग जाते हैं॥ २॥