अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्।
अनाद्यनन्तं महत: परं ध्रुवं
निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते॥ १५॥
यत् =जो; अशब्दम्=शब्दरहित; अस्पर्शम्=स्पर्शरहित; अरूपम्=रूपरहित; अरसम्=रसरहित; च=और; अगन्धवत् =बिना गन्धवाला है; तथा=तथा (जो); अव्ययम्=अविनाशी; नित्यम्=नित्य; अनादि=अनादि; अनन्तम्= अनन्त (असीम); महत: परम्=महान् आत्मासे श्रेष्ठ (एवं); ध्रुवम्=सर्वथा सत्य तत्त्व है; तत् =उस परमात्माको; निचाय्य=जानकर (मनुष्य); मृत्युमुखात् =मृत्युके मुखसे; प्रमुच्यते=सदाके लिये छूट जाता है॥ १५॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें उस परब्रह्म परमात्माको प्राकृत शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धसे रहित बतलाकर यह दिखलाया गया है कि सांसारिक विषयोंको ग्रहण करनेवाली इन्द्रियोंकी वहाँ पहुँच नहीं है। वे नित्य, अविनाशी, अनादि और असीम हैं। जीवात्मासे भी श्रेष्ठ और सर्वथा सत्य हैं। उन्हें जानकर मनुष्य सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाता है॥ १५॥
सम्बन्ध—यहाँतक एक अध्यायके उपदेशको पूर्ण करके अब इस आख्यानके श्रवण और वर्णनका माहात्म्य बतलाते हैं—