यस्त्वविज्ञानवान् भवत्यमनस्क: सदाशुचि:।
न स तत्पदमाप्नोति सॸसारं चाधिगच्छति॥ ७॥
य: तु सदा=जो कोई सदा; अविज्ञानवान्=विवेकहीन बुद्धिवाला; अमनस्क:=असंयतचित्त (और); अशुचि:=अपवित्र; भवति=रहता है; स: तत्पदम्=वह उस परमपदको; न आप्नोति=नहीं पा सकता; च=अपितु; संसारम् अधिगच्छति=बार-बार जन्म-मृत्युरूप संसार-चक्रमें ही भटकता रहता है॥ ७॥
व्याख्या—जिसकी बुद्धि सदा ही विवेकसे—कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञानसे रहित और मनको वशमें रखनेमें असमर्थ रहती है, जिसका मन निग्रहरहित—असंयत है और जिसका विचार दूषित रहता है तथा जिसकी इन्द्रियाँ निरन्तर दुराचारमें प्रवृत्त रहती हैं—ऐसे बुद्धिशक्तिसे रहित मन-इन्द्रियोंके वशमें रहनेवाले मनुष्यका जीवन कभी पवित्र नहीं रह पाता और इसलिये वह मानव-शरीरसे प्राप्त होनेयोग्य परमपदको नहीं पा सकता, वरं अपने दुष्कर्मोंके परिणामस्वरूप अनवरत इस संसार-चक्रमें ही भटकता रहता है—कूकर-शूकरादि विभिन्न योनियोंमें जन्मता एवं मरता रहता है॥ ७॥