यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथे:॥ ५॥
य: सदा=जो सदा; अविज्ञानवान्=विवेकहीन बुद्धिवाला; तु=और; अयुक्तेन=अवशीभूत (चञ्चल); मनसा=मनसे (युक्त); भवति=रहता है; तस्य=उसकी; इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ; सारथे:=असावधान सारथिके; दुष्टाश्वा: इव=दुष्ट घोड़ोंकी भाँति; अवश्यानि=वशमें न रहनेवाली; [भवन्ति]=हो जाती हैं॥ ५॥
व्याख्या—रथको घोड़े ही चलाते हैं, परंतु उन घोड़ोंको चाहे जिस ओर, चाहे जिस मार्गपर ले जाना—लगाम हाथमें थामे हुए बुद्धिमान् सारथिका काम है। इन्द्रियरूपी बलवान् और दुर्धर्ष घोड़े स्वाभाविक ही आपातरमणीय विषयोंसे भरे संसाररूप हरी-हरी घासके जंगलकी ओर मनमाना दौड़ना चाहते हैं; परंतु यदि बुद्धिरूप सारथि मनरूपी लगामको जोरसे खींचकर उन्हें अपने वशमें कर लेता है तो फिर घोड़े मनरूपी लगामके सहारे बिना चाहे जिस ओर नहीं जा सकते। यह सभी जानते हैं कि इन्द्रियाँ विषयोंका ग्रहण तभी कर सकती हैं, जब मन उनके साथ होता है। घोड़े उसी ओर दौड़ते हैं, जिस ओर लगामका सहारा होता है; पर इस लगामको ठीक रखना सारथिकी बलबुद्धिपर निर्भर करता है। यदि बुद्धिरूपी सारथि विवेकयुक्त स्वामीका आज्ञाकारी, लक्ष्यपर सदा स्थिर, बलवान्, मार्गके ज्ञानसे सम्पन्न और इन्द्रियरूपी घोड़ोंको चलानेमें दक्ष नहीं होता तो इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़े उसके वशमें न रहकर लगामके सहारे सम्पूर्ण रथको ही अपने वशमें कर लेते हैं और फलस्वरूप रथी और सारथिसमेत उस रथको लिये हुए गहरे गड्ढेमें जा पड़ते हैं। बुद्धिके नियन्त्रणसे रहित इन्द्रियाँ उत्तरोत्तर उसी प्रकार उच्छृङ्खल होती चली जाती हैं जैसे असावधान सारथिके दुष्ट घोड़े॥ ५॥
सम्बन्ध—अब स्वयं सावधान रहकर अपनी बुद्धिको विवेकशील बनानेका लाभ बतलाते हैं—