इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाॸ स्तेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिण:॥ ४॥
मनीषिण:=ज्ञानीजन (इस रूपकमें); इन्द्रियाणि=इन्द्रियोंको; हयान्=घोड़े; आहु:=बतलाते हैं (और); विषयान्=विषयोंको; तेषु गोचरान्=उन घोड़ोंके विचरनेका मार्ग (बतलाते हैं); आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम्=(तथा) शरीर, इन्द्रिय और मन—इन सबके साथ रहनेवाला जीवात्मा ही; भोक्ता=भोक्ता है; इति आहु:=यों कहते हैं॥ ४॥
व्याख्या—जीवात्मा परमात्मासे बिछुड़ा हुआ है, अनन्त कालसे वह अनवरत संसाररूपी बीहड़ वनमें इधर-उधर सुखकी खोजमें भटक रहा है। सुख समझकर जहाँ भी जाता है, वहीं धोखा खाता है। सर्वथा साधनहीन और दयनीय है। जबतक वह परम सुखस्वरूप परमात्माके समीप नहीं पहुँच जाता, तबतक उसे सुख-शान्ति कभी नहीं मिल सकती। उसकी इस दयनीय दशाको देखकर दयामय परमात्माने उसे मानव-शरीररूपी सुन्दर सर्वसाधनसम्पन्न रथ दिया। इन्द्रियरूप बलवान् घोड़े दिये। उनके मनरूपी लगाम लगाकर उसे बुद्धिरूपी सारथिके हाथोंमें सौंप दिया और जीवात्माको उस रथमें बैठाकर—उसका स्वामी बनाकर यह बतला दिया कि वह निरन्तर बुद्धिकी प्रेरणा करता रहे और परमात्माकी ओर ले जानेवाले भगवान्के नाम, रूप, लीला, धाम आदिके श्रवण, कीर्तन, मननादि विषयरूप प्रशस्त और सहज मार्गपर चलकर शीघ्र परमात्माके धाममें पहुँच जाय।
जीवात्मा यदि ऐसा करता तो वह शीघ्र ही परमात्मातक पहुँच जाता; परंतु वह अपने परमानन्दमय भगवत्प्राप्तिरूप इस महान् लक्ष्यको मोहवश भूल गया। उसने बुद्धिको प्रेरणा देना बंद कर दिया, जिससे बुद्धिरूपी सारथि असावधान हो गया, उसने मनरूपी लगामको इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़ोंकी इच्छापर छोड़ दिया। परिणाम यह हुआ कि जीवात्मा विषयप्रवण इन्द्रियोंके अधीन होकर सतत संसारचक्रमें डालनेवाले लौकिक शब्द-स्पर्शादि विषयोंमें भटकने लगा। अर्थात् वह जिन शरीर, इन्द्रिय, मनके सहयोगसे भगवान्को प्राप्त कर सकता, उन्हींके साथ युक्त होकर वह विषय-विषके उपभोगमें लग गया॥ ३-४॥
सम्बन्ध—परमात्माकी ओर न जाकर उसकी इन्द्रियाँ लौकिक विषयोंमें क्यों लग गयीं, इसका कारण बतलाते हैं—