नैषा तर्केण मतिरापनेया
प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ।
यां त्वमाप: सत्यधृतिर्बतासि
त्वादृङ् नो भूयान्नचिकेत: प्रष्टा॥ ९॥
प्रेष्ठ=हे प्रियतम!; याम् त्वम् आप:=जिसको तुमने पाया है; एषा मति:=यह बुद्धि; तर्केण न आपनेया=तर्कसे नहीं मिल सकती (यह तो); अन्येन प्रोक्ता एव=दूसरेके द्वारा कही हुई ही; सुज्ञानाय=आत्मज्ञानमें निमित्त; [भवति=होती है;] बत=सचमुच ही (तुम); सत्यधृति:=उत्तम धैर्यवाले; असि=हो; नचिकेत:=हे नचिकेता! (हम चाहते हैं कि); त्वादृक्=तुम्हारे-जैसे ही; प्रष्टा=पूछनेवाले; न: भूयात् =हमें मिला करें॥ ९॥
व्याख्या—नचिकेताकी प्रशंसा करते हुए यमराज फिर कहते हैं कि हे प्रियतम! तुम्हारी इस पवित्र मति—निर्मल निष्ठाको देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। ऐसी निष्ठा तर्कसे कभी नहीं मिल सकती। यह तो तभी उत्पन्न होती है, जब भगवत्कृपासे किसी महापुरुषका सङ्ग प्राप्त होता है और उनके द्वारा लगातार परमात्माके महत्त्वका विशद विवेचन सुननेका सौभाग्य मिलता है। ऐसी निष्ठा ही मनुष्यको आत्मज्ञानके लिये प्रयत्न करनेमें प्रवृत्त करती है। इतना प्रलोभन दिये जानेपर भी तुम अपनी निष्ठापर दृढ़ रहे, इससे यह सिद्ध है कि वस्तुत: तुम सच्ची धारणासे सम्पन्न हो। नचिकेता! हमें तुम-जैसे ही पूछनेवाले जिज्ञासु मिला करें॥ ९॥
सम्बन्ध—अब यमराज अपने उदाहरणसे निष्कामभावकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं—