न नरेणावरेण प्रोक्त एष
सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमान:।
अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति
अणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात्॥ ८॥
अवरेण नरेण प्रोक्त:=अल्पज्ञ मनुष्यके द्वारा बतलाये जानेपर; बहुधा चिन्त्यमान:=(और उनके अनुसार) बहुत प्रकारसे चिन्तन किये जानेपर भी; एष:=यह आत्मतत्त्व; सुविज्ञेय: न=सहज ही समझमें आ जाय, ऐसा नहीं है; अनन्यप्रोक्ते=किसी दूसरे ज्ञानी पुरुषके द्वारा उपदेश न किये जानेपर; अत्र गति: न अस्ति=इस विषयमें मनुष्यका प्रवेश नहीं होता; हि अणुप्रमाणात् = क्योंकि यह अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुसे भी; अणीयान्=अधिक सूक्ष्म है; अतर्क्यम्=(इसलिये) तर्कसे अतीत है॥ ८॥
व्याख्या—प्रकृतिपर्यन्त जो भी सूक्ष्मातिसूक्ष्म तत्त्व है, यह आत्मतत्त्व उससे भी सूक्ष्म है। यह इतना गहन है कि जबतक इसे यथार्थरूपसे समझानेवाले कोई महापुरुष नहीं मिलते, तबतक मनुष्यका इसमें प्रवेश पाना अत्यन्त ही कठिन है। अल्पज्ञ—साधारण ज्ञानवाले मनुष्य यदि इसे बतलाते हैं और उसके अनुसार यदि कोई विविध प्रकारसे इसके चिन्तनका अभ्यास करता है, तो उसका आत्मज्ञानरूपी फल नहीं होता, आत्मतत्त्व तनिक-सा भी समझमें नहीं आता। दूसरेसे सुने बिना केवल अपने-आप तर्क-वितर्कयुक्त विचार करनेसे भी यह आत्मतत्त्व समझमें नहीं आ सकता। अत: सुनना आवश्यक है; पर सुनना उनसे है, जो इसे भलीभाँति जाननेवाले महापुरुष हों। तभी तर्कसे सर्वथा अतीत इस गहन विषयकी जानकारी हो सकती है॥ ८॥