श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्य:
शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्यु:।
आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा-
ऽऽश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्ट:॥ ७॥
य: बहुभि:=जो (आत्मतत्त्व) बहुतोंको तो; श्रवणाय अपि=सुननेके लिये भी; न लभ्य:=नहीं मिलता; यम्=जिसको; बहव:=बहुत-से लोग; शृण्वन्त: अपि=सुनकर भी; न विद्यु:=नहीं समझ सकते; अस्य=ऐसे इस गूढ़ आत्मतत्त्वका; वक्ता आश्चर्य:=वर्णन करनेवाला महापुरुष आश्चर्यमय है (बड़ा दुर्लभ है); लब्धा कुशल:=उसे प्राप्त करनेवाला भी बड़ा कुशल (सफल-जीवन) कोई एक ही होता है; कुशलानुशिष्ट:=और जिसे तत्त्वकी उपलब्धि हो गयी है, ऐसे ज्ञानी महापुरुषके द्वारा शिक्षा प्राप्त किया हुआ; ज्ञाता=आत्मतत्त्वका ज्ञाता भी; आश्चर्य:=आश्चर्यमय है (परम दुर्लभ है)॥ ७॥
व्याख्या—आत्मतत्त्वकी दुर्लभता बतलानेके लिये यमराजने कहा—नचिकेता! आत्मतत्त्व कोई साधारण-सी बात नहीं। जगत्में अधिकांश मनुष्य तो ऐसे हैं—जिनको आत्मकल्याणकी चर्चातक सुननेको नहीं मिलती। वे ऐसे वातावरणमें रहते हैं कि जहाँ प्रात:काल जागनेसे लेकर रात्रिको सोनेतक केवल विषय-चर्चा ही हुआ करती है, जिससे उसका मन आठों पहर विषय-चिन्तनमें डूबा रहता है। उनके मनमें आत्मतत्त्व सुनने-समझनेकी कभी कल्पना ही नहीं आती और भूले-भटके यदि ऐसा कोई प्रसङ्ग आ जाता है तो उन्हें विषय-सेवनसे अवकाश नहीं मिलता। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो सुनना-समझना उत्तम समझकर सुनते तो हैं, परंतु उनके विषयाभिभूत मनमें उसकी धारणा नहीं हो पाती अथवा मन्दबुद्धिके कारण वे उसे समझ नहीं पाते। जो तीक्ष्णबुद्धि पुरुष समझ लेते हैं, उनमें भी ऐसे आश्चर्यमय महापुरुष कोई विरले ही होते हैं, जो उस आत्मतत्त्वका यथार्थरूपसे वर्णन करनेवाले समर्थ वक्ता हों। एवं ऐसे पुरुष भी कोई एक ही होते हैं, जिन्होंने आत्मतत्त्वको प्राप्त करके जीवनकी सफलता सम्पन्न की हो; और भलीभाँति समझाकर वर्णन करनेवाले सफलजीवन अनुभवी आत्मदर्शी आचार्यके द्वारा उपदेश प्राप्त करके उसके अनुसार मनन-निदिध्यासन करते-करते तत्त्वका साक्षात्कार करनेवाले पुरुष भी जगत्में कोई विरले ही होते हैं। अत: इसमें सर्वत्र ही दुर्लभता है॥ ७॥
सम्बन्ध—अब आत्मज्ञानकी दुर्लभताका कारण बताते हैं—