दूरमेते विपरीते विषूची
अविद्या या च विद्येति ज्ञाता।
विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये
न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त॥ ४॥
या अविद्या=जो कि अविद्या; च विद्या इति ज्ञाता=और विद्या नामसे विख्यात हैं; एते=ये दोनों; दूरम् विपरीते=परस्पर अत्यन्त विपरीत; (और) विषूची=भिन्न-भिन्न फल देनेवाली हैं; नचिकेतसम्=तुम नचिकेताको; विद्याभीप्सिनम् मन्ये=मैं विद्याका ही अभिलाषी मानता हूँ (क्योंकि); त्वा बहव: कामा:=तुमको बहुत-से भोग; न अलोलुपन्त=(किसी प्रकार भी) नहीं लुभा सके॥ ४॥
व्याख्या—ये अविद्या और विद्या नामसे प्रसिद्ध दो साधन पृथक्-पृथक् फल देनेवाले हैं और परस्पर अत्यन्त विरुद्ध हैं। जिसकी भोगोंमें आसक्ति है, वह कल्याण-साधनमें आगे नहीं बढ़ सकता और जो कल्याणमार्गका पथिक है, वह भोगोंकी ओर दृष्टि नहीं डालता। वह सब प्रकारके भोगोंको दु:खरूप मानकर उनका परित्याग कर देता है। हे नचिकेता! मैं मानता हूँ कि तुम विद्याके ही अभिलाषी हो, क्योंकि बहुत-से बड़े-बड़े भोग भी तुम्हारे मनमें किञ्चिन्मात्र भी लोभ नहीं उत्पन्न कर सके॥ ४॥